क्या बिस्तर घूरते हैं?


इसका बोध उसे तब हुआ जब वो पुराने हॉस्टल के उस कोने में उस बिस्तर के पास अकस्मात आ खड़ा हुआ जिसे वो बरसों पहले छोड़ चूका था। अजनबीपन का चोला ओढ़े वो जैसे ही कमरे के अंदर पहुँचा , कोने में पड़ा लोहे का स्टैंड और उसपे बिछा वो बिस्तर उसे घूर रहा था। वो कोना जहाँ वह सोता था बेशक़ चादर नयी थी पर बिस्तर अपने जैसा लगा। उसे विस्मय हुआ।
अच्छा खासा हॉस्टल के बगल से गुजर रहा था एकाएक इधर आने की क्यों सूझी। सीढ़ी हॉल और कमरों को पार करते हुए सीधा इस कमरे में क्यों ? कौन है यहाँ?ये कोना , ये बिस्तर। Grow up यार। ' अभी भी बच्चों हूँ ' वो खुद से बोल पड़ा।
एक क्षण वह बिस्तर को निहारता रहा फिर एक कुर्सी खींच कर वही बैठ गया। हॉस्टल बिलकुल खाली था और चादर बिलकुल कोरी। वार्डन ने अभी अभी लगाई थी। एकाएक वो उठा और बिस्तर लेट गया। ऐसा करना उसे अज़ीब लग रहा था अन्मयस्क सा वह लेटा रहा। आँखे बंद होते ही पलकों से एक बून्द निकल आई। ये क्या? ऐसा क्यों हुआ? वो खुद चकित हो उठा। प्रश्नों के झंझावात घिर आये। उमड़ घुमड़ कर यही प्रश्न करते , तुम्हारी ये दशा क्यों ? बूँद-बूँद आँखे बरस रही थी। अवचेतन मन चेतन हो रहा था। बुद्धि , प्रश्नों की बौछार छोड़ सावधान से विश्राम की मुद्रा में आ गयी। आराम मिला। लगा कोई उठ रहे टीस ख़त्म हो गयी। उसे लगा जैसे वह माँ के कलेजे से सटा हुआ है और बिस्तर उसके ह्रदय की वेदना को बूँद बूँद पीता जा रहा हो। असंख्य बार ऐसा ही तो हुआ है उसके साथ।
नौ बरस का होगा जब वो इस हॉस्टल में आया था। सात साल इसी कोने में इसी लोहे के स्टैंड पर गुजारा। बाल्यावस्था से किशोरावस्था का गवाह ये बिस्तर उसके असंख्य ख्यालों और स्वप्नों की जन्मस्थली था। प्रथम प्रेम अंकुर यही फूटा और प्रस्फुटित हुआ। एक मीठी दर्द भरी मुस्कान तैर गयी उसके चेहरे पर जब उसे याद आई वो रात जब वो फुट फुट कर रोया था प्रेम के आवेग में। योग और वियोग का पहिला परिचय उसे यहीं हुआ। बोध हुआ , नींव गहरी हुई और सृजन हुआ उसके ह्रदय में साहित्य का। जो कभी पन्नो पर न उकेरा गया पर उसके व्यवहार में दृष्टिगोचर होने लगा। उसका हसमुख चेहरा और आँखों की सच्चाई उसे भीड़ से अलग कर देती।
करवट लेते हुए उसे अपनापन का आभास हुआ। उसे हॉस्टल छोड़े आठ साल हो गए , उसे याद आया।
तो क्या आठ साल तक बिस्तर उसकी राह तकता रहा ? इस भाव से ही उसका शरीर गनगना उठा। अपराधबोध होने लगा। उसे लगा जैसे सब जीवंत है , उसका बिस्तर , लोहे का स्टैंड , कमरे की खिड़की और बाहर से तकता शीशम का पेड़ , जो बरसों से उसकी बाट देख रहे हों। जैसे कोई वर्षों पुराना साथी वर्षों बाद मिलने पर मंद-मंद मुस्कुरा रहा हो। जीवन द्वारा उसके चेहरे पर उकेरे हुए चित्रों को , उम्र के साइड इफेक्ट्स को तलाश रहा हो। घूर रहा हो उसे, उसके अस्तित्व को , उसके बनावटी चलन वाले समाज से परे उसके शुद्ध व्यक्तित्व को। घूर रहा है कोई उसे।

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 अमिताभ

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