कविता बनती है
उनींदे अवचेतन मन में ,
कविता बनती है
ज्यों सरिता बहती है
नवयौवन मन दर्पण में
ज्यों मेघ घुमड़ते हैं
होती बारिश की छन छन
ज्यों प्रात की पहली किरण
कर देती स्वर्णिम आनन
ज्यों पहली बूँद धरा पर उतरती है
कविता बनती है।
लहरों के उग्र प्रहारों से क्षत-विक्षत
मानव के दुर्व्यवहारों से हो विकृत
हिय को मथकर जो बूँद नयन से छलकी है
कविता बनती है।
सोलह श्रृंगार समेटे अपने चितवन में
सोलह व्यवहार समेटे अपने आनन् में
जब इतराकर गोरी दर्पण से तकती है
कविता बनती है।
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