मेरे शब्द मेरे नहीं

आज से ३ साल पहले की बात है , मैं अपने मित्र के साथ IIT का रिजल्ट देखने गया था ! जब वो कैफ़े से रिजल्ट देख कर बाहर आया तो उदास सा दिखा ! मैंने सोचा, पूछूं या न पूछूं ! क्योंकि अनुमान हो चूका था की शायद वह आखिरी प्रयत्न में भी विफल हो गया है ! बाद में पता चला , सिर्फ आधे नंबर कम थे cuttoff से ! वो शांत था ! कैसे रो दे, वो विफल नही था , सिस्टम ने उसे विफल कर दिया , उससे आधे नंबर वाले अच्छे कॉलेज के हकदार थे ! भारत के आधे इंजिनियर आरक्षण से तैयार होते हैं ! खैर , मुझे इसकी चर्चा नही करनी , मैं तो चर्चा करना चाहता हूँ , मेरी कविता की ,, जो बनी थी उसी समय ,, ऑन the स्पॉट ....
मेरे शब्द मेरे नही 
          किसके हैं ?

कहीं उसके तो नही
जिसे देखा था मैंने,कल कैफे में 
विफल हतास !
अपूर्णता का अपार एहसास 
दुर्भाग्य और दर्द का सहवास 
समेटे चेहरे पर !

एक गहरी रेखा 
वेदना की 
और संवेदना मेरे मन में 
पूछ बैठा कारण खास 

अब क्या था ?
टूट गया बाँध 
आक्रोश का 
क्या कुसूर था ?
निर्दोष का 

एक का आधा 
न कम न ज्यादा !
इतने ही अंको से 
आ गया बाहर, 
मीठे सपनो से 
जो थकावट की गहरी नींद में बुने थे !
बड़े हौसलों से , 
जो अब न आयेंगे ! 
बारी आखिरी थी 
पर नींद आखिरी नहीं !

थपथपाया मैंने , 
कमजोर कन्धों को , 
मुरझाये हुए फूल , सी फीकी मुस्कान 
भीगी आँखे बेजान ! 

व्यंग की हर आखिरी दीवार ,
तोड़कर जो निकली हाहाकार 
वो मुस्कान , बहुत कुछ कह गयी 
कई लहरे उठीं और ढह गयीं !


हाँ, शब्द नही थे मेरे पास , सिर्फ भावनाएं थी ! क्या समझाता उसे ? वो खुद समझदार था, हिम्मत नहीं हुई, उसे रोकने की .. रोने से ! कुछ तो मन हल्का कर ले .. ! उसके पिताजी ऑटो ड्राईवर थे और एक सवर्ण (तथाकथित) भी ! यही उसका दुर्भाग्य था , और पतन भी ! उसके तीन प्रयत्न पुरे हो गये ! तीन  भागीरथ प्रयत्न ! गया जैसे छोटे शहर में रहकर IIT के अन्दर दाखिले का उसका संघर्ष आधे नंबर से रुक गया !  टूट गया वो , मूक और अवाक् था मैं व्यवस्था पर ! 

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