प्रिय मित्र
पिछली बार तुमने झिड़क दिया था मुझे ! कहा था ,धर्म क्या है! "धर्म कुछ नही होता ये एक पाखंड है" यही कहा था न तुमने ! चलो मैं तुमसे एक प्रश्न करता हूँ ! "तुम्हारा बाप कौन है ?"
पिता जन्म देता है, पालन पोषण कर बड़ा करता है ! मुश्किलों से लड़ना सिखाता है ! सामाजिक दाव पेंच सिखाकर छोड़ देता है , अपने पुत्र को जीवन यापन हेतु शिक्षित कर ! इसलिए कहा गया है ," पितृ देवो भवः"! आज समाज परिवर्तन की राह पर है , ये परिवर्तन नया नही है! परिवर्तन का मतलब ये नही की हम पहचान विस्मृत कर दें ! जैसे आज कल के पुत्रों ने अपने पिता को विस्मृत कर दिया है ! आज पिता , एक मित्र की तरह व्यवहार करने पर विवश है ! उन्हें पता है की उनका पुत्र , परिवर्तन के विद्रोही वातावरण का अगुआ बना है ! कभी भी, सीमायें लांघ सकता है , झिड़क सकता है , मार सकता है ! मेरे मित्र, क्या तुम्हारे पिता भी नए ज़माने में ऐसा ही महसूस कर रहे हैं ? अगर हाँ, तो रुको , जरा याद करों , आज तुम आजाद मार्गों पर कदम बढ़ा रहे हो अपने ऊपर कोई धर्म नही लादना चाहते ,, ये क्यों भूल रहे हो की जिन कदमो से तुम दूरी तय कर रहे हो , उस कदम की पहली संकल्पना जब तुम्हारे मस्तिस्क में आई थी और तुम असहाय थे , प्रयत्नों के वावजूद भी गिर पड़ते थे , तब पिता की उँगलियों ने धर्म धारण कर तुम्हे सहारा दिया था !
माफ़ करना , मुझे ऐसा शीर्षक देना पड़ा ! पर क्या तुम भी माफ़ी मांगोगे , तुमने धर्म के अस्तित्व को अपनी नादानी से नकारने का प्रयास किया था ! ऐसा प्रतीत हुआ था , जैसे तुम कह रहे हो , मेरा कोई बाप नहीं , मैं तो अनायास ही पैदा हो गया ! हरामीपन की इस भावना में तुम स्वच्छंदता महसूस कर रहे हो तो क्यों नही तुम्हारी पुत्री कम कपड़ों में खुद को सुन्दर समझने की मानसिकता धारण कर ले !
तुम भूल जाते हो , अपनी माता को , जो तुम्हारे परिवार में धर्म की आधार स्तम्भ हैं ! समय से तुम्हारी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर देतीं हैं ! बदले में कुछ नही लेतीं ! यही उनका धर्म है , कभी सोंचा है , क्या हो अगर वो भी धर्म त्याग दें ? तोड़ दें सारे बन्धनों को , हो जाये तुम्हारे नए ज़माने सी स्वच्छंद ! आजाद देशों के आजाद माँ की तरह (तुम्हारी नजर में )! कल्पना करों , की तुम उन्ही (प्रेम, आदि रंगों में ) में देख रहे हो उड़ते, खुले आकाश में अपने समान्तर अपनी माँ-बहनों को ! जो तुम्ही से प्रेरणा पाकर धर्म से आज़ाद हुईं हैं ! क्या तुम कर सकते हो ? हां, हां, तुम्हे करना ही होगा ! जिस स्वच्छंदता के भविष्य में तुम जाना चाहते हो वहाँ ऐसे अनुभव मिलेंगे ही , और शायद तुम नजरे मिला न पाओ खुद से ! क्यूंकि तब, तुम्हे खुद की उड़ान ही असहज प्रतीत होगी ! तब तुम प्रयास करोगे बंदिशे आरोपित करने की , धर्म की दुहाई दोगे उन्हें, पर कौन सुनेगा ! जिस धर्म मुक्त समाज की तुम अगुआई कर रहे हो उसका भविष्य यही है ! तब पिता भी नहीं होंगे, तुम्हारी सहायता को ! विक्षिप्त हो जाओगे ,..
.चलो छोडो , कह दूं , जो कहना चाहता था ! तुम्हारा उत्तर, स्पष्ट शब्दों में ! क्यूंकि ऊपर जो बातें मैंने लिखीं है वो धर्म के अपमान से आहत होकर , तप्त होकर लिखीं हैं ! और तुम नही जानते .. और नहीं जानती तुम्हारी नयी पीढ़ी .
अब सुनो , धर्म की बात जो कहना चाहता हूँ ! धर्म का मतलब सिर्फ पूजा पाठ नहीं ! धर्म का विषय बहुत व्यापक है ! तुम ये समझ लो की धर्म कर्तव्य है ! जैसे:- जिसने तुम्हे जन्म दिया उसका पालन पोषण करना (माता-पिता), जिसने जन्म दिया और पालन पोषण किया, कृतज्ञ होकर उसका निर्वाह करना (पुत्र), पति और पुत्र दोनों को अपने आँचल में समेटने वाली (माता), और परिवार में सभी की सेवा करने वाली(बहन), सभी प्राणियों को आश्रय और पोषण प्रदान करने वाली धरती माँ, और धरती का संतुलन बनाये रखने के लिए आरोपित सनातन धर्म ! यही क्रम है , अगर इतनी बातें तुम्हारे मस्तिस्क में घर कर जाएँ तो बता देना , हम आगे भी पत्र व्यवहार करेंगे , ईश्वर और उसकी सत्ता पर !
हाँ, एक निवेदन है! जरा आसपास नजरें दौड़ना और देखना की धर्म त्यागने वाले कितने सुखी हैं !
तुम्हारा मित्र
अमिताभ
पिछली बार तुमने झिड़क दिया था मुझे ! कहा था ,धर्म क्या है! "धर्म कुछ नही होता ये एक पाखंड है" यही कहा था न तुमने ! चलो मैं तुमसे एक प्रश्न करता हूँ ! "तुम्हारा बाप कौन है ?"
पिता जन्म देता है, पालन पोषण कर बड़ा करता है ! मुश्किलों से लड़ना सिखाता है ! सामाजिक दाव पेंच सिखाकर छोड़ देता है , अपने पुत्र को जीवन यापन हेतु शिक्षित कर ! इसलिए कहा गया है ," पितृ देवो भवः"! आज समाज परिवर्तन की राह पर है , ये परिवर्तन नया नही है! परिवर्तन का मतलब ये नही की हम पहचान विस्मृत कर दें ! जैसे आज कल के पुत्रों ने अपने पिता को विस्मृत कर दिया है ! आज पिता , एक मित्र की तरह व्यवहार करने पर विवश है ! उन्हें पता है की उनका पुत्र , परिवर्तन के विद्रोही वातावरण का अगुआ बना है ! कभी भी, सीमायें लांघ सकता है , झिड़क सकता है , मार सकता है ! मेरे मित्र, क्या तुम्हारे पिता भी नए ज़माने में ऐसा ही महसूस कर रहे हैं ? अगर हाँ, तो रुको , जरा याद करों , आज तुम आजाद मार्गों पर कदम बढ़ा रहे हो अपने ऊपर कोई धर्म नही लादना चाहते ,, ये क्यों भूल रहे हो की जिन कदमो से तुम दूरी तय कर रहे हो , उस कदम की पहली संकल्पना जब तुम्हारे मस्तिस्क में आई थी और तुम असहाय थे , प्रयत्नों के वावजूद भी गिर पड़ते थे , तब पिता की उँगलियों ने धर्म धारण कर तुम्हे सहारा दिया था !
तुम भूल जाते हो , अपनी माता को , जो तुम्हारे परिवार में धर्म की आधार स्तम्भ हैं ! समय से तुम्हारी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर देतीं हैं ! बदले में कुछ नही लेतीं ! यही उनका धर्म है , कभी सोंचा है , क्या हो अगर वो भी धर्म त्याग दें ? तोड़ दें सारे बन्धनों को , हो जाये तुम्हारे नए ज़माने सी स्वच्छंद ! आजाद देशों के आजाद माँ की तरह (तुम्हारी नजर में )! कल्पना करों , की तुम उन्ही (प्रेम, आदि रंगों में ) में देख रहे हो उड़ते, खुले आकाश में अपने समान्तर अपनी माँ-बहनों को ! जो तुम्ही से प्रेरणा पाकर धर्म से आज़ाद हुईं हैं ! क्या तुम कर सकते हो ? हां, हां, तुम्हे करना ही होगा ! जिस स्वच्छंदता के भविष्य में तुम जाना चाहते हो वहाँ ऐसे अनुभव मिलेंगे ही , और शायद तुम नजरे मिला न पाओ खुद से ! क्यूंकि तब, तुम्हे खुद की उड़ान ही असहज प्रतीत होगी ! तब तुम प्रयास करोगे बंदिशे आरोपित करने की , धर्म की दुहाई दोगे उन्हें, पर कौन सुनेगा ! जिस धर्म मुक्त समाज की तुम अगुआई कर रहे हो उसका भविष्य यही है ! तब पिता भी नहीं होंगे, तुम्हारी सहायता को ! विक्षिप्त हो जाओगे ,..
.चलो छोडो , कह दूं , जो कहना चाहता था ! तुम्हारा उत्तर, स्पष्ट शब्दों में ! क्यूंकि ऊपर जो बातें मैंने लिखीं है वो धर्म के अपमान से आहत होकर , तप्त होकर लिखीं हैं ! और तुम नही जानते .. और नहीं जानती तुम्हारी नयी पीढ़ी .
अब सुनो , धर्म की बात जो कहना चाहता हूँ ! धर्म का मतलब सिर्फ पूजा पाठ नहीं ! धर्म का विषय बहुत व्यापक है ! तुम ये समझ लो की धर्म कर्तव्य है ! जैसे:- जिसने तुम्हे जन्म दिया उसका पालन पोषण करना (माता-पिता), जिसने जन्म दिया और पालन पोषण किया, कृतज्ञ होकर उसका निर्वाह करना (पुत्र), पति और पुत्र दोनों को अपने आँचल में समेटने वाली (माता), और परिवार में सभी की सेवा करने वाली(बहन), सभी प्राणियों को आश्रय और पोषण प्रदान करने वाली धरती माँ, और धरती का संतुलन बनाये रखने के लिए आरोपित सनातन धर्म ! यही क्रम है , अगर इतनी बातें तुम्हारे मस्तिस्क में घर कर जाएँ तो बता देना , हम आगे भी पत्र व्यवहार करेंगे , ईश्वर और उसकी सत्ता पर !
हाँ, एक निवेदन है! जरा आसपास नजरें दौड़ना और देखना की धर्म त्यागने वाले कितने सुखी हैं !
तुम्हारा मित्र
अमिताभ


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