यमुनोत्री के बाद हमलोग उत्तरकाशी पहुंचे . उत्तरकाशी उत्तराखंड का एक जिला है ! यहाँ से चारोधाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के लिए बसे उपलब्ध हैं ! आइये चित्रकथा के माध्यम से हम उत्तर काशी का दर्शन करें.
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| उत्तरकाशी बस अड्डे पर लगा हुआ उत्तराखंड का नक्शा |
| उत्तरकाशी से अन्य जगहों की दूरी का चित्रपट |
| उत्तरकाशी का जिला न्यायालय ! हमे सोंचा विश्वनाथ मंदिर घूम लिया जाये ! रस्ते में ही जिला न्यायालय दिखाई दिया ! |
| उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर के बगल का हनुमान मंदिर ! द्वार अभी निर्माणाधीन था ! |
| केदारनाथ की त्रासदी पर बनी ये गहडवाली फिल्म का पोस्टर आप देख रहे हैं ! ये त्रासदी अभी भी वहां के जनमानस के लिए न भूलने वाली है ! पीछे शिव विराजमान हैं और सबसे पीछे उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर का द्वार ! |
| इस तस्वीर को गौर से देखिये ! ये मंदिर अभी बन रहा था ! यहाँ मंदिर दर्शन करने के बाद हमने गूगल सर्च किया तो पता चला की यहाँ आदि काल से एक त्रिशूल गडा है ! जिससे माँ दुर्गा ने महिसासुर का वध किया था ! हमे वो कही नहीं दिखाई दिया ! फिर सर्च करने के बाद , हमने नजरें दौड़ाई तो वो सामने ही दिखा ! इस त्रिशूल को कोई नहीं हिला पता पर अनामिका उंगली के स्पर्श से यह कम्पन करने लगता है , हमने भी महसूस किया ! |
| जय हो ! काशी विश्वनाथ ! यहाँ आके हम पापी भी आपके प्रभाव से पाप मुक्त हो गया ! कुछ और दिलचस्प बातें पता चली ! भारत में पञ्च काशी हैं ! काशी (बनारस) , उत्तरकाशी , गुप्तकाशी , कांची और एक जिसका मैं नाम भूल रहां हूँ ! उत्तरकाशी के बारे में ये लिखा है की जब काशी (बनारस) जलमग्न हो जाएगी तब यही काशी कहलाएगी ! |
| ये मेरे अभिन्न मित्र और पथप्रदर्शक राहुल सिंह थे ! जो अब हमारे बीच नही हैं ! इनसे ज्यादा संयमी, और ज्ञानी व्यक्ति के सान्निध्य मुझे आज तक प्राप्त नही हुआ ! इनके साथ मैंने कई यात्रायें की ! हरिद्वार , ऋषिकेश , गंगोत्री , यमुनोत्री अभी पिछले साल ही हम कामख्या गये थे ! मानव कब जानता है की उसका अंत निकट है ! परन्तु जब मृत्यु निकट आती है तो उसे सत्य का भान होता है ! ब्रम्हा सत्य जगत मिथ्या ! ॐ नमः शिवाय ! |
| और ये मैं , ढोंगी ! |
| ये देखिये त्रिशूल . इसपर ऐसा कुछ लिखा हुआ है जिसे आज तक कोई नहीं पढ़ पाया . वैज्ञानिकों ने इसे एलियन भाषा कहा ! |
| और ये पंडित जी त्रिशूल के चरणों में सेवा करते हुए ! |
| मंदिर दर्शन करने के पश्चात् फिर से वहीं, होटल में ! दिन भर गंगोत्री की यात्रा मे थकावट हो आई थी ! वहीं बिरला धर्मशाला मे थोड़ा आराम मिला ! |
| शाम को फिर से हम घूमने निकले . अँधेरा हो आया था ! काशी की तरह ही यहाँ , हरिश्चंद्र घाट , दशाश्वमेध घाट और मणिकर्णिका घाट हैं ! घुमते घुमते हम एक सुनसान जगह पर आ गए ! इधर कोई नहीं था ! ये गंगा का किनारा ही था ! यहाँ मोक्ष द्वार लिखा हुआ था ! और माँ काली की वीभत्स प्रतिमा स्थापित थी ! अंधेरा घिर आया था ! पीछे पीपल का एक वृक्ष था जिसमे कई घड़े लटके हुये थे ! जैसे मृतकों के अंतिम संस्कार के घट हों ! बगल में ये छोटा सा मंदिर था हमने सोंचा आए हैं तो फोटो ले लिए जाए ! हम लोग बारी बारी से एक दूसरे का फोटो ले रहे थे तभी एक अद्भुत घटना हुई जो हमारी पूरी यात्रा में चर्चा का विषय बनी रही ! |
| देखिये इस तस्वीर को गौर से |
| इस फोटो को देखिये यहाँ बिलकुल अँधेरा था सिर्फ फ़्लैश लाइट की रौशनी चमकी फोटो खीचने के समय ! फिर ये आकृति फोटो में कहा से आ गयी ! जबकि वहां कोई प्रकाश का अंश नही था ! मेरा मानना है की ये कोई अदृश्य आत्मा वगैरह होगी ! शायद ! |
| पीछे देखिये श्मशान काली की प्रतिमा ! |

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