| A Legend journey of Gangotri and Yamunotri |
पितरो के किये पुण्य प्रभाव से और इश्वर की प्रेरणा से पित्र्पक्ष शुरू होने के २ दिन पहले मैं गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा पर निकला ! मेरे साथ मेरे मित्र थे जो पटना के रहने वाले हैं ! यह हमने पहले ही निश्चय कर लिया था की येन केन प्रकारेण, हिमालय की यात्रा करनी है !
मेरी यात्रा मेरे शहर गयाजी से शुरू हुयी ! मोक्ष दायनी पितरो की नगरी में पितृपक्ष हेतु पितृ देव पधार चुके थे दो दिनों बाद यात्रियों की चहल पहल भी शुरू होने वाली थी ! यात्रा पूर्व प्रायोजित थी टिकेट बन चूका था ! मेरे मित्र पटना से थे हमने तय किया की यात्रा प्रयाग से शुरू की जाए ! २८ को शाम में हमारा प्रयाग से ट्रेन (संगम एक्सप्रेस ) में आरक्षण था ! मैंने २७ को तडके प्रातः ही गयाजी से काशी नगरी को प्रस्थान किया ! वहां कुछ मित्रो से मिलना भी था ! और काशी प्रयाग के रश्ते में ही आता है ! मैं भी अपनी प्रिय नगरी काशी जाने के बहाने ढूँढा करता हूँ ! काशी आजकल बनारस कहा जाता है मेरे कई मित्र यहाँ रहते हैं ! यहाँ आते ही मुझे मेरे अंतर में अजीब सी हलकी हलकी ख़ुशी होने लगती है ! कई बार मैंने इसकी चर्चा भी की तो एक बुजुर्ग ने मुझे जो बताया वो आश्चर्य चकित करने वाला था ! उन्होंने बताया काशी नगरी शिव के त्रिशूल पर स्थित है ! यह शिव की नगरी है ! वैसे तो पूरा उत्तरप्रदेश (उत्तराखंड अब ) देव भूमि है अयोध्या काशी और मथुरा तीनो यहाँ हैं ! फिर स्वर्ग और हिमालय दोनों उतराखंड में विराजमान हैं इसी कारण इस नगरी में आते ही आनंद आने लगता है !
काशी में कुछ जरूरी काम निपटा कर मित्रो से मिलने चला गया ! उन्होंने भी उत्तराखंड विशेष कर यमुनोत्री और गंगोत्री यात्रा पर जानकारी मांगी ! और कहा की तुम पहले घूम आओ बाद में हम भी आयेंगे ! उनका साधोवाद लेकर आगे बाधा ! आज ही प्रयाग पहुचना था ! मेरे मित्र भी पटना से यहाँ आने वाले थे ! हमलोग करीब ८ बजे तक प्रयाग पहुचे !वहां मैं अपने छोटे भाई विपुल के पास ठहरा ! अगले दिन शाम को हमारी ट्रेन थी हरद्वार तक ! तय यह हुवा की सुबह प्रयाग में संगम में स्नान किया जाए और शाम तक आराम से ट्रेन पकड़ कर हरद्वार जाया जाए ! पर किंचित कारणों से हम संगम नहीं जा सके और दिन भर कमरे में ही आराम करने का निश्चय किया !
दिन भर आराम करने के बाद शाम को आराम से हम अल्लाहाबाद स्टेशन आ गए ! थोड़ी ही देर में ट्रेन भी आ गयी ! पहली बार मैं हिमालय की यात्रा पे जा रहा था कुछ गर्म कपडे भी साथ थे अनुमान था की शायद हरद्वार में ठण्ड लगने लगे ! जल्द ही अँधेरा हो गया ! हम लोग आराम से अपने अपने सीट पर सो गए ! सुबह जल्द ही उठे ! मौसम ठंडा था ! सामने की RAC वाली सीट खली ही थी उसी पे बैठ गया ! आते जाते घर हां, गन्ने के खेत शायद हम उत्तराखंड की भूमि पर प्रवेश कर चुके थे ! दूर कही बिजली के तारो पे दर्जन चिड़ियाँ के घोसले दिख जाते !
११ बजे के करीब हम हरद्वार पहुच चुके थे ! वही स्टेशन के पास ही बजरंग दल के कार्यालय में पहुचे ! प्रान्त प्रमुख से मिले ! ये करीब ६० साल के साढ़े ६ फीट लम्बे योद्धा की तरह दिखने वाले थे ! बड़े प्रेम से इन्होने हमारे रहने की व्यवस्था कर दी ! हमने तय किया की पहले चल के हर की पौड़ी में स्नान किया जाए फिर भोजन ! हम जल्द ही कपडे और कैमरे लेकर हर की पौड़ी की ओरबढे ! पहली बार हर की पौड़ी देखि ! और देखा भगवन महादेव शिव की ४० फीट उची प्रतिमा को ! और गंगा नदी के बीचो बीच में बनी घड़ियाल पे बैठी माँ गंगा की मूर्ति ! बहाव बहुत तेज था ! चारो और सिक्कड़ लगे हुए थे ! मेरे मित्र ने बताया की पिछले साल की अपेक्षा साफ़ सफाई अधिक थी ! चारो और प्लास्टिक ban के बैनर लगे हुए थे ! शायद मोदी जी के नमामि गंगे परियोजना का असर दिख रहा था ! और कानो में गूंज रहा था ! हर हर गंगे जय माँ गंगे !
पानी बहुत ठंडा था ! मैं तो कमर तक ही सीढ़ी पे उतर सका ! फिर भी २० २५ डुबकिय लगा ही ली ! अब पितृपक्ष भी प्रारंभ हो चूका था और ऐसे समय तीर्थ दर्शन गंगा स्नान का विशेष फल पितरो को मिलता है ! और हमारे पूर्वज तृप्त हो के हमे आशीर्वाद देते हैं ! माँ गंगा मोक्षदायिनी हैं ! सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए प्रकट हुयी थी ! इनके प्रवाह को रोका जाना संभव नहीं था ! अतः महादेव शिव ने माँ गंगा को अपनी मस्तक पे धारण किया ! अपनी जाता में लपेट लिया ! संसार की सभी ध्वनियाँ गंगा की कलकल बहाव के शोर में जाती हैं ! और गंगा किनारे कई लोग ध्यान लगते भी दिख जाते हैं !
आज कल हरिद्वार में काफी भीड़ हो रही थी ! ये सितम्बर के अंतिम में भी (चूँकि पर्यटक सीजन ख़त्म होने वाला था ) अभी भी श्रधालुओं की कमी नही थी ! फिर हम वापस लौटे !वही बजरंग दल के कार्यालय में ! हमारे रहने का प्रबंध उन्होंने कर दिया था ! सेवा , सुरक्षा और संस्कार जो की उनका जयघोष है उनके कर्त्तव्य में भी नजर आता है ! दिन भर वही आराम करने के बाद शाम में माँ गंगा की आरती देखने के लिए हम निकले ! रात्रि में माँ गंगा का प्रवाह शायद और तेज हो जाता है !करीब ५००० लोगो की भीड़ थी !
हरिद्वार की गंगा आरती बहुत ही भव्य होती है ! सैकड़ो की संख्या में विदेशी भी खड़े थे ! ये पापियों के मुह पे करार तमाचा है जो धर्मं निरपेक्षता की आड़ में अपने सनातन धर्म को यथासंभव गाली देते है ! और इसकी बदनामी करने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ते ! पर हमारे धर्म की अलग ही नैशार्गिक सुन्दरता है ! गीता में प्रभु ने कहा है की कही भी कोई भी किसी को भी इश्वर मान के पूरी श्रधा से पूजता है वो मुझ तक ही आता है ये दूसरी बात है की प्रभु उसे उसी रूप में दर्शन देते हैं ! विदेशो में लोग ये सुन कर भी हैरान रह जाते है की हम नदियों पहाड़ो और प्रकृति की पूजा करते हैं !
उन्हें मा की संज्ञा देते हैं !इसीलिए हम सनातन है और हम हमेशा बने रहेंगे ! क्योंकि हिन्दू कभी भी किसी का अहित नही करता जब तक की बात हमारे धर्म की सहिस्नुता से ऊपर उठ जाए ! और हमारे यही सुन्दरता उन्हें(विदेशियों ) को आकर्षित करती है !
आरती के बाद हम करीब घंटे भर वही घाट पे बैठे रहे ! वहां से चलने का मन ही नहीं हो रहा था ! मन शांत था ! गंगा अविरल बह रही थी और हम भी भावनाओं में !
९ बजे हम वापस लौटे .......
अगले दिन हमे यमुनोत्री जाना था ,....
किसी ने बताया था की हरिद्वार बस स्टैंड से सीधे यमुनोत्री की बस मिल जाती है ! अतः हम ५ बजे ही बस स्टैंड पहुच गए ! पर हमे वो बस कही नही मिली ~! फिर हमने तय किया की देहरादून चला जाए ! और वहां से बारकोट की बस पकड़ी जाए !!
देहरादून की बस मिल गयी ! करीब ७ बजे तक हम देहरादून बस अड्डे पर आ चुके थे ! पर यहाँ से बारकोट जाने के लिए कोई बस नही थी ! फिर हमे बताया गया की देहरादून स्टेशन के पास जो बस अड्डा है वह जाईये पहाड़ी जगहों पर जाने के लिए बसे यही से मिलती है !!
हम ऑटो से मसूरी बस अड्डा आये ! पता चला की बारकोट की बस १२ बजे है ! फिर उन्होंने हमे कहा की ९ बजे नौगाँव की बस आयेगी आप उसे पकड़ लें ! नौगाँव से बारकोट ज्यादा नही केवल १२ किलोमीटर है ! और देहरादून से नवगांव करीब १३५ किलोमीटर !!
| देहरादून शहर की एक झांकी चलती बस से। |
९ बजे के करीब बस आई ! यहाँ से बस की १३५ किलोमीटर की यात्रा ! मुझे बस में बहुत मितली आती है ! ज्यादातर मैं ट्रेन से यात्रा करता हूँ !!
आगे का यात्रा का विवरण चित्रों के माध्यम से .
| ऐसे खेत देहरादून पार होते ही दिखने शुरू हो जाते हैं . पहाड़ी खेती ऎसी ही होती है . |
| यमुनोत्री से पहले हनुमानचट्टी नाम का गाँव आता है .. पहले लोग यहीं से उतर कर आगे जाते थे .. पर अब जानकी चट्टी जो कुछ आगे है वहां तक बस जाती है .. |
| ये नया मंदिर बन रहा है यमुनोत्री में .. जब सब बर्फ से ढँक जाता है तो साल के छः महीने यही पूजा अर्चना होगी .. मंदिर निर्माणाधीन है . |
| राहुल भैया बड़े सरल स्वाभाव के व्यक्ति थे .. आप इनकी वेशभूषा से अंदाज़ा लगा सकते है .. |
| और ये कल कल करती हुई यमुना की धारा , अभी हम ऊपर जा रहे है .. |
| आप देख सकते हैं कितने पतले रस्ते हैं ,, जानकीचट्टी से यमुनोत्री की दुरी ६ किलोमीटर की चढ़ाई है ...आसान नही |
| ये महाशय अयोध्या से आये थे .. मैंने पूछा भगवान जी को पहचानते हैं ? अयोध्या के ही रहने वाले हैं . इन्होने कहा की नही पहचानते .. |
| कही कहीं झरने भी झरते हैं इनसे रास्तो को बचाने के लिए शेड लगाये गएँ हैं . |
| घोड़ों की भी व्यवस्था है .. इनका चार्ज ८०० से १००० रुपये तक है ... और मौसम के मुताबिक बदलता है .. |
| ये रास्ते में पड़ने वाला भैरव मंदिर है .. |
| चलिए आप भी दर्शन कर लीजिये .. श्री भैरव नाथ का ... |
| इस जगह को भैरव घाटी भी कहा जाता है ... सुदूर पहाड़ों पर देखिये ... सुनहली धुप दिखाई देगी. अभी जहाँ हमलोग खड़े थे वो जगह छाया क्षेत्र में आता है ... |
| दूर दूर तक फैला हिमालय और उसका साम्राज्य गुनगुनी धुप का आनंद ले रहा है .. आशा है आप भी आनंद ले रहे होंगे मानसिक यमुनोत्री की यात्रा का ... |
| २०० मीटर दूर पावन यमुनोत्री धाम की एक झलक .. सभी थकावट मिट गयी. |
| इतना नीला आकाश आपने सिर्फ वॉलपेपर या चित्रों में ही देखा होगा .. यकीन मानिये .. ऐसा ही है यमुनोत्री धाम . |
| कड़ाके की ठण्ड में सुकून देता गर्म पानी का ये कुंड, तीर्थ यात्री यहाँ स्नान कर अपनी थकावट दूर करते हैं और पश्चात् पूजा आरम्भ करते हैं . |
| यमुनोत्री मंदिर बाहर से .. चित्र साफ़ नही आया .. |
| मंदिर के बाहर फोटो खिचवाता मैं , मंदिर की सुन्दरता को विकृत करता हुआ... |
| बस ऊपर ही है ये पहाड़ .. आप भी अवलोकन कर लें |
| मंदिर के बगल में चल रहा कोई निर्माण कार्य .. दो पुलिस वाले बात करते हुए .. |
| हम कुछ ऊपर और चढ़े शुद्ध जल लेने के लिए .. गैलन में यमुनोत्री का जल लेते हुए .. ब्रम्हलीन राहुल भैया |
| प्रकृति को निहारता मैं ... |

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