क्या गौमाता बचायेगी सरकार के 11000 करोड़ रुपये?
आप सभी जानते हैं कि खाने की तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। खाने के तेल में मुख्यतः सरसो तेल, पाम आयल, सोयाबीन का तेल, मूंगफली का तेल और नारियल के तेल आते हैं। अब चूंकि इन तेल की कीमतें कम नही हो रही और कम आय वाले निचले और मध्यम वर्ग के लोगों को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। जनता में बढ़ती नाराजगी को देख कर सरकार भी जागने का प्रयास कर रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने खाने के तेल के ecosystem को सुदृढ़ करने के लिए 11000 करोड़ रुपये निवेश करने की घोषणा की है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने कोरोना काल मे अच्छा प्रदर्शन किया है और आज हम कृषि उत्पा दों के निर्यात में दुनिया के प्रमुख 10 देशों में शामिल हैं । परंतु हमे सिर्फ गेहूं , चावल ही नही बल्कि खाने के तेल का भी उत्पादन बढ़ाना होगा। अब चूंकि खाने के तेल की कीमतें बहुत ही अधिक बढ़ गयी हैं इसलिए इसे एक लोक कल्याणकारी कदम माना जा रहा है ।
परंतु सरकार आज भी कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को दरकिनार कर रही है। खाने के तेल के विकल्प भी हैं जैसे घी, मख्खन आदि। केंद्र की हिंदुत्व वादी सरकार चाहे तो इसे एक अवसर के तौर पर प्रयोग कर गौवंश संवर्धन का काम कर सकती है। गौवंश के संवर्धन पर सरकारी नीतियां आ जाने से फिर से इस देश मे घी दुग्ध की नदियां बहने लगेंगी।
अब आप एक सवाल करेंगे कि गौ आदि का घी तो बहुत महंगा होता है और आम जनता की पहुँच से काफी दूर तो फिर इस कदम से आम मानव कैसे लाभान्वित होगा। तो इसका उत्तर है जब घी मक्खन आदि का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होगा तो सम्पन्न लोग उसका उपभोग करेंगे जिससे खाने के अन्य सरसो आदि तेलों पर उनकी निर्भरता कम होंगी ।जिससे सरसो आदि तेलों के दाम में गिरावट आ सकती है और लोगों के स्वास्थ्य में भी सुधार होगा।
अब सिक्के के दूसरे पहलू के बारे में जानते है। भारत मे 2021 के जनवरी के महीने में रिकॉर्ड 1 लाख टन के पाम आयल का आयात हुआ है। यह तेल हम मुख्यतः इंडोनेशिया और मलेशिया से मंगाते हैं। आप सभी जानते ही हैं कि मलेशिया ने हाल के ही दिनों में भारत का कश्मीर के मुद्दे पर हर मंच से आलोचना करी है। मलेशिया और और इंडोनेशिया मुस्लिम बाहुल्य देश हैं ASEAN देशों में आते हैं। भारत से अधिक ये पाकिस्तान के करीब माने जाते हैं। कुछ दिन पहले जब मलेशिया ने भारत की आलोचना की थी तो भारत ने रिफाइंड पाम आयल के आयात पर बैन लगा दिया था । तब हम इंडोनेशिया से क्रूड पाम आयल खरीदने लगे थे उसी समय एक पाम आयल रिफाइनरी सेटअप करने की घोषणा भी हुई थी। ज्ञात हो की भारत मे edible आयल की खपत ही इतनी अधिक है कि हम इसकी आपूर्ति के लिए मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों पर ही निर्भर हैं।
खैर सरकार इसपर देर से जगी है और उसे भी ये अहसास हो गया है कि पेट्रोल आदि के लिए पश्चिमी मुस्लिम देशों और खाद्य तेलों के मामलों में पूर्वी मुस्लिम देशों पर निर्भरता खत्म करनी होगी। आज जब देश में पेट्रोल और खाद्य दोनों तरह के तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं तब देश के आम नागरिक को भी ये अहसास हो रहा है कि किस बुरी तरह हमारी निर्भरता अत्यावश्यक वस्तुओं के लिए भी अन्य देशों पर है।
अब आते हैं अपनी घी, मक्खन आदि की संवर्धन क्षमताओं पर। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड बताता है कि 2019 में देश मे 8 करोड़ 10 लाख दूध देने वाली गायें हैं । जबकि 5 करोड़ के लगभग वैसी भैंसे हैं जो दूध देती हैं । अब आप ये बताएं कि अगर इनकी संख्या दो गुनी कर दी जाए तो क्या होगा? सोचिए। न सिर्फ हम घी का प्रयोग खाद्य तेल के रूप में कर पाएंगे जिसका प्रयोग हमने महंगा होने के कारण छोड़ दिया था बल्कि अपने लाखों करोड़ों डॉलर की भी बचत कर पाएंगे।
सरकार 11000 करोड़ खर्च कर के किसानों को खाद्य तेल के बीजों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित तो कर सकती है पर उसे ये भी ध्यान रखना होगा कि कृषि योग्य जमीन एक सीमित संसाधन हैं और अगर हम तिलहन उत्पादन अधिक करेंगे तो दलहन , और गेहूं आदि रबी फसलों पर इसका असर पड़ेगा और इनके उत्पादन कम होने की आशंका होंगी और फिर दलहन की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
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