TUM HATH CHUDAKAR CHALI GAYI ! बिहारी छोरा

तुम प्यास जगाकर चली गयी !
तुम हाथ छुड़ाकर चली गयी !
मैं फिर भी मंदिर जाऊँगा .
जो पत्थर बन के बैठा है .
एक प्रश्न पूछ कर आऊँगा .
तुम हाथ छुड़ाकर चली गयी.

अब जीवन क्या ?
है त्याग दिया ,
आशा , तृष्णा, सारे विकार,
कुंडली मार जो बैठा था
मेरा शत्रु अदृश्य प्यार,
हा , त्याग दिया !


हा त्याग दिया
ये मरण मोह,
कंटक पर ही अब चलना है ,
आभूषण सज्जित रखा था !
इस देह को भी अब गलना है !
कर रहा रोम रोम हाहाकार !
सुखी आँखें -सुखा प्रवाह
विस्मृत बुद्धि , प्रस्फुटित आह
कल-कल छल-छल जल-जल निर्मल
आवेगों, वेगों का प्रवाह
तुम प्यास जगाकर चली गयी ! !

थे ख्वाबो में जब फूल बिछे
तब रैना थी रजनीश सजी
जब धधक रही ज्वाला जल जल
और घुमड़ रहे बादल कड कड
तब छलक रही नैना भर भर
तुम हाथ छुड़ा कर चली गयी

यत्न करूँ की करूँ प्रयाण
सन्यास करूँ या अनुसन्धान
मारू या फिर मैं मर जाऊं
उदेश्य हीन का क्या प्रमाण
तुम आस मिटा कर चली गयी !


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