जगन्नाथ पूरी की यात्रा


जगन्नाथ , जगत + नाथ , जो इस जगत का पालन करने वाले हैं , उनकी राजधानी जगन्नाथ पूरी जाने का सौभाग्य  २०१६ के अप्रैल में मुझे मिला .
बड़े भैया का एग्जाम सेंटर पूरी में ही था तो मैं भी साथ हो लिए .. बचपन से समुद्र देखने की इच्छा थी . पूरी में वो इच्छा पूरी हो गयी . चलिए चित्रकथा के माध्यम से पूरी का दर्शन करें .. 
सागर के तट पर मुठ्ठी में सुनहरी रेत को पकड़ने का असफल प्रयास करता हुआ मैं असीम आनंद की अनुभूति कर रहा हूँ .. यहाँ के नमकीन पानी में भी बहुत सी मिठास घुली है .... यादों की ,, प्रतिदिन हजारो लोग यहाँ आते हैं और मीठे पल बिता कर चले जाते हैं .. आज इस जमीन पर मेरा अधिकार है ..  कभी कभी सोचता हूँ की सागर भी नितांत अकेला है दिनभर गुलज़ार ,  और रात में सुनसान ...  वैसे भैया ने कहा की चलो आगे तक वहां जहाँ उची लहरे उठ रही है पर मैं नही गया ... कही सागर की वर्षो के एकांत को भंग कर उसमे मिल न जाऊं ,,,, वैसे सागर के द्वारा ये सफल असफल प्रयास चलता ही रहता है ... कितने लोग सागर की एकांत कुंठा का शिकार हो इसमें मिल जाते हैं .... पर मुझे जल्दी नही ,, अभी मिलन का समय नही ,, वियोग का है ... चित्र में पीछे देखिये लोग आगे बढ़ कर चुनौती देते हुए ... 


देखिये जरा,  जैसे सागर को लोटे में समेटना संभव नही ,, वैसे ही व्यक्तित्व को फोटो में समेटना संभव नही.... अरे भाई मैं अपनी प्रशंसा नही कर रहा .... जरा टी शर्ट को तो देखिये Ocean Travel लिखा है ... वही दिखा रहा हूँ ... सर पे कफ़न बांधकर सागर लाँघ कर आया हूँ ... मेरा मतलब है नहाकर .. सुबह में लहरें ज्यादा तेज होती है शाम की तुलना में ... 

मेरे बड़े भाई .. बहुत आजमाया सागर को, खूब नहाये , दूर दूर तक गए ...  मजा आ गया ...  हम दोनों भाई सन्यासी हैं ,,,सिर्फ त्याग करते हैं  छोड़ देते है ... सब कुछ ,,, अपना.... कभी कभी ... जमाना छीन भी लेता है ......
कोई फर्क नही ... आज मैं ऐसी जगह आया हूँ जो इतनी बड़ी है कोई छीन नही सकता ,,, समेट नही सकता अंक में ....
उसकी यादों की तरह विस्तृत है यह सागर ... अनंत कालों तक रहेगा ,, मैं रहूँ न रहूँ.. तुम रहो न रहो 

ऐसे प्यार करने वाले लोग कम ही मिलते हैं .. मेरा सौभाग्य है ... 

होटल के कमरे में ... 

मंदिर जाने के लिए तैयार होते हुए ..... 

जगन्नाथ पूरी मंदिर दर्शन करने के पश्चात् ...प्रसाद जिसे यहाँ अकठा कहते है हाथ में लिए हुए .
होटल से हम १० बजे निकल चुके थे .. खाली पैर ,, धुप बहुत तेज थी ... वहीं शंख , सीपियों को देखते हुए हम करीब साढ़े दश तक मंदिर पहुचे .. लम्भी कतार थी ... मन ही मन भगवन को नमन करते हुए अन्दर प्रवेश किया ... मंदिर बहुत बड़ा और भव्य है ... लगता ही नही की मनुष्य निर्मित है लगता है विश्वकर्मा ने इसका निर्माण किया है .. मंदिर के बाहर मंदिर के अन्दर का शोर नहीं सुनाई पड़ता .. और भी कई आश्चर्यजनक बातें होती हैं भगवान जगन्नाथ के मंदिर में ... खैर धुप इतनी तेज थी की फोटो खिचवाने में पैर बुरी तरह जल गए ... हालाँकि होटल के छत पर अच्छी हवा चल रही थी 

शाम को एक बार फिर गए .. घुमते फिरते .. सागर के तट पर ... अब लहरों में उतनी गर्मजोशी नही थी ... आप भी देखिये ... हां ,, अंत नजर नही आता , जहाँ भी देखो अथाह जल राशी नज़र आती है ..


मैं और मेरे ज्वाला भैया .. अभी सागर की तरह शांत हैं कब ज्वालामुखी बन जाएँ , अंदाजा नही लगाया जा सकता ...
इस तरह हमारी पूरी यात्रा ख़त्म हुई ... अप्रैल का महीना था ,, बहुत प्यास लग रही थी .. ट्रेन में हमलोग करीब ४- ५ सौ रूपए का पानी पी चुके थे ... विश्वास नहीं होगा .. पानी वाला पानी लाकर रख देता था कहता था पैसा बाद में देना ... हा हा हा 



यात्रा से इतना थक हार कर घर पंहुचा तो बेटे के गोद में ही सो गया ... 
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