फौजी का स्वप्न

एक फौजी का स्वप्न 
मेरे भाई भी फौज में हैं।  ये लेख उन्ही को समर्पित है। 
उसका सोता चेहरा मुस्कुरा उठा।
स्वप्न भी अज़ीब होते है साथ नही छोड़ते । आशा,ख़ुशी,प्रेम, आलिंगन जैसे कितने ही काल्पनिक भावों को समेटे ये स्वप्न उस उस फौजी के चेहरे पे मुस्कान ला रहे थे । अभी अभी स्पेशल ड्यूटी से लौटा वो जवान लेटते ही सो गया। ऐसी नींद हर किसी को नसीब नही। सोते ही अपने घर के दरवाजे पर पहुँच जाता है। 
उसकी माँ दरवाजा खोलती है। उसके कंधो को पकड़कर उसे अंदर ले जाती है। घर की जानी पहचानी खुशबू उसके नथुनों में भर जाती है। वो धम्म से बैठ जाता है। इतनी ख़ुशी में थोडा ठहर जाने का जी करता है। लेकिन अभी उसे उठना है कमरे से निकलते पिताजी के पैर छूने हैं । पिताजी उसे कंधे पकड़ कर फिर से बैठा देते हैं। 

पुरे आंगन में वह नज़र दौड़ाता है। फिर माँ कुछ इशारा करती है और वो शर्मा जाता है। उस कमरे की तरफ देखता है। फिर घर का हाल चाल पूछने लगता है । अबकी माँ उसे भेज ही देती है। वो धीरे धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ता है । पत्नी दरवाजे के पीछे ही खड़ी है । वो अपने प्रियतम को आते देखकर एक क्षण को आँखे बंद कर लेती है। चेहरे पे ख़ुशी की लालिमा बिखर जाती है।

पति के उठते हर एक कदम उसके ख्यालों में एक दिया जला देते हैं ।।एक सुगंध उसे मौन और मदहोश कर देती है।। तभी जवान कमरे में प्रवेश करता है। एक क्षण से अधिक वो प्रियतम के चेहरे को नही देख पाती । नज़रें नीची हो जाती हैं ।। 

सीने की धड़कने तेज, और अनंत ख़ामोशी और दिल, वहां तो सर्जिकल स्ट्राइक हो रहा होता हैं। सभी शिकायतें ध्वस्त और कल्पना शक्ति भी क्षीण हो जाती है ।। 

ये क्या होता है भावातिरेक में आँखों से दो बूंद निकल आते हैं।। पर ये तो शुरुआत है।। 

आमंत्रण है ,उस बरसात का जिस में ह्रदय अपना सागर उड़ेल देगा । और अनवरत बरसात होने लगती है।।
 हैं ,यह क्या?
 वह तो खुश है फिर रोना क्यूँ।।
 पर रोकना भी असंभव हो जाता है।

जवान कमरे में प्रवेश करता है और थाम लेता है उसका हाथ।  अगले ही पल मथ जाता है उसका ह्रदय जब प्रियतम के कपोलों पर अश्रु झरते हैं। 

जी चाहता है तमाम गोलियां अज्ञात के सीने में उतार दे !
 धड़ धड़ धड़ धड़।
 कलेजा मुह को आ जाता है। अपने खुरदरे हाथो से उसके आंसुओं को पोछता है ,गालों पे थपकियाँ देता है ,सर को सहलाता है और सीने से लगा लेता है।

देव देखते हैं इस मिलन को, ख़ामोशी से। माँ महसूस करती है एक ठंढक सी, पिता तो हिमाचल की ऊंचाई प्राप्त करते है और प्रियतमा आनंद का चरमोत्कर्ष ।। 

ये समाधी है ,सभी इसमें लीन हैं ।
 ये जवान , उसकी प्रियतमा, उसके माँ-बाप, प्रारब्ध और देव ।। प्रेम को इससे सुन्दर आश्रय और कहीं नही।।

सभी मगन होते हैं, तभी जवान घबराने लगता है । ये दीवारें हिल क्यों रही हैं? वो पत्नी को जोर से भींच लेता है .सीने में । उसकी साँसे जवान के सीने पर महसूस हो रही हैं। पकड़ कमजोर पड़ रही है, उसका दम घुटने लगता है। वो प्रियतमा के हाथों को पकड़ने की कोशिश करता है पर हार जाता है।। 

अगले ही क्षण सब गायब,अपने आप को आसमान में पाता है बहुत ऊँचाई पर ! नीचे देखता है ,पहचान नही पाता ।। शरीर पसीने से लथपथ, डर लगता है और उसे सायरन की आवाज़ सुनाई देती है।। 

हैं हैं , ये आवाज़ तो जानी पहचानी है ! शरीर अकड़ने लगता है  और उसकी आँखे खुल जाती हैं।।। सामने टंगी वर्दी पर निगाह जाती है। । ये क्या दो घंटे हो गए।।

अगले दो मिनट में तैयार भी होना है।। आज दीपावली भी है। तभी उसे स्वप्न याद आता है।।। हाय! वह उसे हैप्पी दीपावली भी नही कह सका ।। साढ़े बारह किलो के mg एसएलआर को कंधे पे टांग के मन ही मन कहता है- दीपावली न सही खून की होली ही।।। 

और वह कुपवाड़ा के जंगल में सर्च ऑपरेशन के लिए निकल जाता है।।।
जय माता दी ।
भारत माता की जय ।

सभी जवानो को दीपावली की ढेरों शुभकामनाएँ ।।

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।। देखना है जोर कितना बाजु ए कातिल में है।।।

वंदे मातरम्।



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