अब का मैं २४ का होने जा रहा हूँ ! बचपन गुजर गया, किशोर अवस्था भी बीत गयी , जवानी चल रही है , धीरे-धीरे ! शनै: शनै: !
एक बच्चा बचपन में अपनी चंचलता से ख्यात होता है , जितना चंचल वो होता है उतना ही Macho. या ये कह सकते है की अगल बगल के लोगों में उसका उतना ही नाम होता है ! अब जैसे ही हम थोड़े बड़े होते है नौवी-दसवीं कक्षा में पढ़ने लायक ! उस समय सबकी नजरें पढाई पे टिक जाती है , क्या पढता है ? फर्स्ट आता है कि नही परीक्षा में ! बच्चों के लक्षण भी उसी समय दिखने लगते है ! दिक्कत ये होती है की फर्स्ट की एक ही कुर्सी होती है क्लास में ! बाकि सब लड़के साल भर के लिए बदनाम हो जाते है ! पिताजी के ताने सुन सुन कर किशोर अवस्था की कितनी खुशियाँ कितनो ने गवां दी , अगर उसका हर्जाना रुपये-पैसे में मिले तो उस बेचारो को जीवन भर पैसों की कमी न हो !
कभी मैं सोचता हूँ ? मैं २४ का होने वाला हूँ , दूर तक निगाह जाती है , दिखती है कई चिंताए , कई परेशानियाँ जो मैं पार कर आया , कई खुशियाँ , कई किस्से जो मेरे इतिहास में गुम है और उन किस्सों में छुपे है , हास्य, विषाद , रस , श्रृंगार के कई आयाम , अगर मैं न सुनाऊँ तो क्या फायदा मेरे अन्दर साहित्य के सृजन का !
(बचपन)
क्या तुम मुझे जानते हो ?
मैं वही बच्चा हूँ !
जो यहाँ गलियों में खेला करता था
बच्चों के संग मस्ती का रेला करता था
अमरुद चुराया करता था
टाफियां खाया करता था
बड़े लोगों से डर जाया करता था
मैथ की किताबों को छोड़कर
कॉमिक्स में खो जाया करता था !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
(किशोर)
क्या तुम मुझे जानते हो ?
मैं अपने हाई स्कूल में टॉप आया था
माँ ने मेरा माथा सहलाया था
पिताजी ने पीठ थपथपाई थी
सबकी शाबाशी की आवाज मेरे
कानो में आई थी
क्या हुआ था उस पल ?
उनकी आँखों के सपने मेरी आँखों में आ गए !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
(युवा)
क्या तुम मुझे जानते हो ?
मेरा एक नाम है !
छोटी सी पहचान है !
आँखों में अरमान हैं
गाँव को छोड़कर जा रहा हूँ ,
चमकते शहर में
यादों के निशान है !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
(शहर में संघर्ष )
क्या तुम मुझे जानते हो ?
थका हुआ हूँ मैं ,
बोझ तले ,
कैसा बोझ?
उनके अरमानों का ,
इस शहर में अपने बदलते ठिकानों का
वक्त-वेवक्त
दिल का बोझ उठाने से
टूट गया हूँ मैं !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
(जब लगी छोटी सी चाकरी )
नही , तुम मुझे नही जानते !
मैं कभी फर्स्ट नही आया ,
न ही , मैंने अमरुद चुराकर खाया !
मैं तो जागरूक स्वामिभक्त
किसी स्वामी का सेवक हूँ !
वो लोग जो मेरे शहर के हैं ,
उनकी आशाओं का वाहक हूँ !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
(कुछ दिनों के बाद जब मेरे बच्चे हो जायेंगे )
अब मुझे कोई नही जानता ,
एक आम इन्सान हूँ !
महंगाई से परेशान हूँ ,
दाल रोटी खाता हूँ !
हरि के गुण गाता हूँ
और अपने बच्चों के
सुनहले कल के सपने सजाता हूँ !
क्या तुम मुझे जानते हो ?
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