कट्टर मुस्लिम या कट्टर हिन्दू ? Social issue, Social Reforms, Fanatic, Social mindset


कट्टर कौन हिन्दू या मुस्लिम?

हिंदुस्तान में यह सवाल अगर किसी से पूछ दो तो उसका एक ही जवाब होगा। कट्टर तो मुस्लिम ही होते हैं हिन्दू अपने धर्म को लेकर उतने कट्टर नही हुआ करते।

आज हम इस चर्चा को एक नए नजरिये से देखेंगे।

शादी विवाह - एक मुस्लिम किसी मुस्लिम,ईसाई, हिन्दू बौद्ध, पारसी या अन्य किसी से भी शादी कर सकता है ज्यादातर मामलों में कोई रोक नही होती । अपवाद छोड़कर। भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृति के प्रभाव से कुछ मुस्लिम अपनी बेटियों के शादी में ना नुकुर जरूर करते हैं। मैं पठान हूँ और तू कसाई मेरी बेटी तेरे घर कभी नही जाएगी। और कभी लड़का लड़की दोनों ने अगर भाग कर भी शादी कर ली तो बाद में पठान अपनी बेटी को ले आएंगे और जबरदस्ती ही सही कहीं और निकाह करने की चेष्ठा करेंगे। हां पर पता नही क्यों ये अपनी बेटियों का निकाह इस्लाम से अलग धर्मो में नही करते। 
अब इनके लड़को को तो खुली छूट है कि किसी भी लड़की से निकाह कर लो परिवार भी अक्सर स्वीकार कर ही लेता है।
तो आप विश्लेषण करें कि ये स्वीकृति कट्टरता है क्या ?
दूसरी तरफ हिन्दू , बेटा हो या बेटी , कोई भी धर्म तो क्या किसी दूसरी जाति में भी शादी कर ले तो परिवार उसे त्याग देता है। समाज बहिस्कृत कर देता है । उसके बेटे बेटियों की शादी में भी रुकावट आती है ।
इसी क्रम में मुझे वीर कुंवर सिंह की याद आती है जो 1857 कि लड़ाई में 80 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों से लड़े। उसी समय किस्सा है कि लड़ाई के दौरान वो अपने हाथी पे चढ़ के गंगा नदी पार कर रहे थे । उसी समय अंग्रेज़ो की एक गोली उनके बाजू में लगी। उन्होंने उसी समय वो बाजू काट कर गंगा को समर्पित कर दिया और कहा कि अंग्रेजों की अपवित्र गोली मेरे शरीर मे एक क्षण भी नही रह सकती। ऐसी कट्टर देश भक्ति की मिसाल थे वीर कुंवर सिंह।

तो अब आप बताएं कि कौन कट्टर हुआ सनातनी हिन्दू या वर्णशंकर मुस्लिम।

खान पान- 
ऐसा देखा गया है कि अक्सर मुस्लिम लोग साथ मे खाना खाते हैं। इसमें कोई परहेज नही होता लोग इसे प्रेम की मिसाल मानते है कि साथ खाने का मतलब सम्मान देना। 
हिंदुओं में भी अतिथी को भगवान का दर्जा प्राप्त है परंतु एक थाली में खाने की अनुमति नही। यहां तक कि बाप और बेटे भी अलग अलग थाली में खाते हैं। अगर परिवार के सदस्यों से इतर अगर कोई घरेलू थाली में भोजन करले तो उस थाली को अपवित्र मान कर आग में डाला जाता था । आग में डालने के बाद बरतन शुद्ध हो जाता था । इस प्रथा की वैज्ञानिकता तो अब समझ मे आती है कोरोना ने आखिर बहुत कुछ सीखा दिया। तो अब बताओ कि कट्टर कौन है हिन्दू या मुस्लिम?

खानदान vs गोत्र

मुसलिमों में बाप के खानदान को ज्यादा अहमियत दी गयी है पर मिला जुला के इनके पुर्वजो को खोज पाना टेढ़ी खीर है। निकाह में इतनी लचीलापन है कि यह बहुत ही सरल है जिससे अक्सर ही निकाह रिश्तों में ही हो जाता है। तुर्क,फारसी,अफगानी,भारतीय न जाने कितने रक्त का मिश्रण है भारतीय मुश्लिम समाज। 
दूसरी ओर हिंदुओं में शादी के वक्त दोनों कुलों की तीन पीढ़ियों को खंगाला जाता है कि रक्त दोष तो नही है (अपवाद हो सकते है) यानी कि शादी का उद्देश्य ही यही होता है कि श्रेष्ठ कुल में वरण हो ज्यादात्तर लोगों के पूर्वजों का इतिहास पता होता है। तो आप बताइए कि कट्टर कौन है?

रावण सीता का हरण कर लेता है तो रामायण हो जाती है । सूर्पनखा के अपमान को रावण बर्दास्त नहीं करता क्योंकि वो रिश्ते में रावण की बहन लगती थी जो कि राम रावण के महायुद्ध का कारण बना। महाभारत में द्रौपदी के अपमान के कारण इतना बड़ा महायुद्ध हुआ । और आप कहते हैं कि फलां कट्टर है हम नही। इतिहास झांक के देखें तो अपनी धरती के लिए अड़ जाने वाले महाराणा प्रताप कट्टर थे या अकबर।
आज तालिबान के डर से भाग जाने वाला पठान अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी कट्टर है या सीमा पे आतंकवाद को झेलती पर एक इंच पीछे न हटने वाली हमारी सेना।

कट्टरता के कई अन्य पैमाने भी हैं। जैसे युद्ध के हमारे नियमों का कट्टरता से पालन । शरणागत की रक्षा इतनी कट्टरता से की मौत भी न डिगा पाए(राणा हम्मीरदेव)। पीठ पे वार न करना और भागते हुए शत्रु पर वार न करने की नीति ने मोहम्मद गोरी , महमूद गज़नी और अन्य कितनो को ही कितनी बार जीवनदान दिया है। कट्टरता का लेवल इतना हाई है कि सर कट जाता था पर धड़ भी लड़ता था क्योंकि मातृभूमि की रक्षा का संकल्प लेकर योद्धा युद्ध में जाता था। दूसरी तरफ मुग़लो के लिए युद्ध मे कोई नियम नही। हारने लगने पर यह पीठ दिखा कर भाग जाते। पीठ पर वार करना , धोखा देना, अपने ही पिता की गद्दी के लिए हत्या इनके लिए आम बात है। 

फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ अपनी राय से मुझे अवगत जरूर कराएं की कट्टर कौन है हिन्दू या मुस्लिम? अगर इतिहास में झांका जाए तो यही कहा जायेगा कि हम अभी अभी शरीफ हुए हैं। 

Note: भावनाएं भड़काना हमारा उद्देश्य नही भावनाओं को सामने रखना उद्देश्य है। पसंद आये तो शेयर करें।
 

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