मेरे बारे में जानें. Amitabh mishra blog The oath breaker blog.




मैं जड़ हूँ , 
     तुम जीवन हो . 
मैं मन हूँ , 
     तुम यौवन हो .

अप्रकट हो तुम 
      मैं चकित हुआ,
जिस क्षण देखा  
      उस क्षण तुम हो, 
जिस कण देखा ,
     उस कण तुम हो .

मैं डूब चूका 
         गहराई में 
क्या रखा है ?
         सुनवाई में .
यह नीच जगत 
        ताना मारे .
मैं खुश हूँ अब ,  
        पगलाई में ,
जब आँख मूंदे ,
       सुन्दर तुम हो 
जब साँस चले 
        जीवन तुम हो . 

आधारशिला सा रखा है ,
     प्रियतम तुमको, इस जीवन में 
अन्यथा , 
ये जीवन भी क्या जीवन है ?
जो जीवन बिन प्रियतम तुम हो !



नासमझ हूँ मैं , क्या परिचय दूँ ? 
                  मेरी कोई पहचान नही . 
संघर्षरत हूँ . उस नाविक की तरह , जिसकी नाव तूफान से नष्ट हो चुकी है . किनारे पर पहुँचने का असफल प्रयास करता हूआ वह लहरों के थपेड़ों से जूझ रहा है . उसके लिए दिशाओं के कोई मायने नही . उत्तर , दक्षिण, पश्चिम , कुछ नही , उसे सिर्फ किनारा चाहिए . अथाह जल में बस आकाश ही उसकी उम्मीद का झरोखा है . जब तक बादल दीखते रहेंगे उसकी आशाएं जागृत रहेंगी . 
  
वह संघर्ष क्यों कर रहा है ? डूब क्यों नही जाता ? सब लोग डूबे हुए हैं , फिर इस संघर्ष का क्या प्रयोजन ?
उत्थान में संघर्ष है, पतन में सुख. फिर उत्थान से पतन की आशंका भी है ? फिर क्यों ?
क्यों नही सोच रहा वह पतन के बारे में , जहाँ वह गहराई में पैठ सके , मोतियाँ चुन सके , श्रृंगार के साधन जुटाए, क्रीडा करे और संसार-सागर का अभिन्न अंग बन जाये ..  
क्योँ जा रहा है विपरीत ? उर्ध्वगामी .



क्या है ऊपर ? 
सत्य लोक ?   तप लोक ?    स्वर्गलोक ?
क्या चाहिए उसे ?

क्यों उलीच रहा है अपने मन के विकार को ? क्यों त्याग रहा है पतन की कामना ?
काम- जिसे श्रृष्टि की उत्पति का श्रेय प्राप्त है , क्यों  धूमिल करना चाहता है उसके गौरवशाली शौर्य को ?

क्यों ?


यह 'क्यों' अनिश्चित है .

हम मानव क्यों बने , दानव क्यों नहीं ?
मुझे स्वर्ग-नरक नहीं पता . फिर इस उत्थान की अभिलाषा क्यों ?
'असतो माँ सद्गमय' की अवधारणा क्यों? जब लक्ष्य हो स्पष्ट न हो तो संघर्ष व्यर्थ है . 
यही है मेरा संघर्ष . यही हूँ मैं . नश्वर . 
अंततः व्यर्थ ...







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