मैं जड़ हूँ ,
तुम जीवन हो .
मैं मन हूँ ,
तुम यौवन हो .
अप्रकट हो तुम
मैं चकित हुआ,
जिस क्षण देखा
उस क्षण तुम हो,
जिस कण देखा ,
उस कण तुम हो .
मैं डूब चूका
गहराई में
क्या रखा है ?
सुनवाई में .
यह नीच जगत
ताना मारे .
मैं खुश हूँ अब ,
पगलाई में ,
जब आँख मूंदे ,
सुन्दर तुम हो
जब साँस चले
जीवन तुम हो .
आधारशिला सा रखा है ,
प्रियतम तुमको, इस जीवन में
अन्यथा ,
ये जीवन भी क्या जीवन है ?
जो जीवन बिन प्रियतम तुम हो !
नासमझ हूँ मैं , क्या परिचय दूँ ?
मेरी कोई पहचान नही .
संघर्षरत हूँ . उस नाविक की तरह , जिसकी नाव तूफान से नष्ट हो चुकी है . किनारे पर पहुँचने का असफल प्रयास करता हूआ वह लहरों के थपेड़ों से जूझ रहा है . उसके लिए दिशाओं के कोई मायने नही . उत्तर , दक्षिण, पश्चिम , कुछ नही , उसे सिर्फ किनारा चाहिए . अथाह जल में बस आकाश ही उसकी उम्मीद का झरोखा है . जब तक बादल दीखते रहेंगे उसकी आशाएं जागृत रहेंगी .
वह संघर्ष क्यों कर रहा है ? डूब क्यों नही जाता ? सब लोग डूबे हुए हैं , फिर इस संघर्ष का क्या प्रयोजन ?
उत्थान में संघर्ष है, पतन में सुख. फिर उत्थान से पतन की आशंका भी है ? फिर क्यों ?
क्यों नही सोच रहा वह पतन के बारे में , जहाँ वह गहराई में पैठ सके , मोतियाँ चुन सके , श्रृंगार के साधन जुटाए, क्रीडा करे और संसार-सागर का अभिन्न अंग बन जाये ..
क्योँ जा रहा है विपरीत ? उर्ध्वगामी .
क्या है ऊपर ?
सत्य लोक ? तप लोक ? स्वर्गलोक ?
क्या चाहिए उसे ?
क्यों उलीच रहा है अपने मन के विकार को ? क्यों त्याग रहा है पतन की कामना ?
काम- जिसे श्रृष्टि की उत्पति का श्रेय प्राप्त है , क्यों धूमिल करना चाहता है उसके गौरवशाली शौर्य को ?
क्यों ?
यह 'क्यों' अनिश्चित है .
हम मानव क्यों बने , दानव क्यों नहीं ?
मुझे स्वर्ग-नरक नहीं पता . फिर इस उत्थान की अभिलाषा क्यों ?
'असतो माँ सद्गमय' की अवधारणा क्यों? जब लक्ष्य हो स्पष्ट न हो तो संघर्ष व्यर्थ है .
यही है मेरा संघर्ष . यही हूँ मैं . नश्वर .
अंततः व्यर्थ ...

0 Comments