हिन्दी साहित्य की दुर्दशा

जी हां , इस ज़माने में साहित्य दोयम दर्जे पर है , कविता , कहानियों , उपन्यास और व्यंग आदि के पाठक नहीं मिल रहे . कहा गए ये लोग ? इन्टरनेट की बढती माया ने हर चीज लोगो को हाथोहाथ उपलब्ध करा दी . पर हिंदी साहित्य के पाठक वर्ग की अभी भी घनघोर कमी है ? साहित्य का स्थान, वेज-नॉन वेज चुटकुलों ने ले लिया है जो व्हात्सप्प और दुसरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दौड़ते रहते हैं . साहित्य हमारे वीरो की गौरव गाथा की तरह अछूत होता जा रहा है , जिसे अब पुस्तकों में भी जगह नहीं. स्कूल की किताबें ही उठा लो , उलटी सीधी कहानियो से भरी हुई जिसमे बच्चे की रूचि नहीं. मुझे याद है जब हमलोग सरकारी स्कूल में पढ़ते थे , तब हिंदी को सबसे आसान सा विषय मानते थे . हर लड़का हिंदी में पास हो जाता था . आजकल हिंदी पढ़ाने के लिए बच्चों को ट्यूशन लगाया जा रहा है . हिंदी की इस दुर्दशा का श्रेय हमारे अंग्रेजी माध्यम के पढ़े-लिखे सिविल सर्विस के अफसरों को जाता है . मेरा मत है की इनकी उपेक्षा ही हिंदी की दुर्दशा का कारण है . सरकार भी हिंदी और राष्ट्रवाद की मूल भावना से कोई सरोकार नहीं रख रही . आज हिंदी किताबों में दलित और कम्युनिस्ट विचारकों के नीरस व्याख्यान भरे पड़े है . जिसे पढ़कर हर किसी का मन खट्टा हो जाता है .. एक लेख मैंने लिखा था ...जो की सबसे अधिक बार पढ़ा गया है . अस्तु वो हमारा विषय नहीं . आज तो साहित्य की उपयोगिता सिद्ध करके ही लौटेंगे . 

चलिए पहले मेरी एक कविता पढ़ें :

शीर्षक : अभी बाकि है .

अभी बाकि है , 
                      फूलों का खिलना 
                      चिड़ियों का गाना 
                      भवरों का गुनगुनाना 
                              आम आदमी की मुस्कान 
अभी बाकि है 
   
अभी बाकि है 
                     बेड़ियों का टूटना 
                     अहंकार रूपी मेघ 
                     और आसुओं की बारिश 
                                 पश्चाताप ख़ालिस
अभी बाकि है 

अभी बाकि है   
                     सुधारना खुद को
                     की हुई भूल
                     और  रिश्तों में जमी हुई धुल 
                                          हटाना 
अभी बाकि है 
अभी बाकि है 
                     बच्चों से सीखना 
                     हँसना , रोना , प्यार करना 
                     खुल के इजहार करना 
अभी बाकि है 

अभी बाकि है 
                     बार बार जन्म लेना 
                     तेरी आँचल में 
                                    मेरी माँ 
अभी बाकि है 

अभी बाकि है 
                     मेरी सोंच का बदलना 
                     गुरुजनों की सीख 
                     और नैतिक शिक्षा का वह पाठ 
                                             अमल करना 
अभी बाकि है 

अभी बाकि है 
                      मेरा शहरी बनना 
                      कायदे से रहना 
                      ठठाकर न हँसना 
अभी बाकि है .


मनुष्य की यह प्रवृति रही है वो छुपी हुई चीजो को उजागर करना चाहता है . घूंघट में छिपे मुखड़े आज भी आकर्षण के केंद्र होते है . साहित्य में मनुष्य एक सन्देश प्राप्त करता है जब वह उलझ जाता है किसी दुसरे के लिखे विचारों से . उसे आनंद आता है जब वह पंक्तियों में छुपी हुई सुन्दरता को संघर्ष कर समझ पाता है . साहित्य आनंद का प्रसार करता है . अच्छा साहित्य मन को स्वस्थ रखता है . 

तभी तो कहा गया है की

" साहित्य संगीत कला बिहीना '
   साक्षात् पशु पुच्छ विषण हीना "

साहित्य , संगीत और कला के व्यक्ति बिना सींघ पूंछ के पशु के समान है . आइये साहित्य से  संसार को शुद्ध करें.  ये कविता मैंने छब्बीस जनवरी को लिखी थी २०१५ में . आपको कैसी लगी सन्देश जरूर प्रेषित करें !

धन्यवाद .

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