उस रात , उसने कहा था ,
" एक दिन मैं तुम्हे छोड़कर चली जाऊंगी "
उस रात की सुबह हो गयी पर नींद न आई . आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे . लग रहा था , कही ऐसा हो गया तो ?
गर्मियों की वो रात तब देखते ही देखते कट गयी . फिर मैंने खुद से सवाल पूछा .
"क्या तुम उसे देख पाओगे, खुद से दूर जाते हुए ?
जवाब में , बरसने लगा मैं, खुद पर . चोट जो लग थी मेरे स्वाभिमान पर . दूर आसमान में सुबह की लालिमा दिखाई देने लगी थी . पागल सा कुछ ढूँढने लगा था मैं , दर्द से निजात पाने के लिए . तभी हाथ आयी मेरी डायरी. चल पड़ी कलम , अपने सवालों का खुद जवाब देने . पर सुना किसने . वहां तो सिर्फ मैं था , मेरी डायरी , मेरी कलम और मेरी धुंधली परछाई . तब मैंने कहा ....
जब कोई आरजू न रहे
मिलने की
जब कोई आस न रहे
जब मेरे बिन,
दिल उदास न रहे
तो चली जाना ...
गहरी रातो में
जब जगता हूँ मैं
और सोये हुए तुम,
ख्वाबों में ,
मेरी तलाश न रहे
तो चली जाना....
उठती हैं उँगलियाँ
ज़माने की ,
मुझपर
तेरे नाम से
ग़र आभास न हो
तो चली जाना ...
सोचता है कोई
बेचैन सा
तुम बिन
हिचकियों पर ,
विश्वास न हो
तो चली जाना ....
फ़िर जाऊँगा ,
इकरार से.
ग़र लगता हो
आजमाना
मर्द की जुबान न हो
तो चली जाना ....
कभी देखना
मेरी सुनी आँखों में
तेरे
सुर्ख होठों का ,
रुआब न हो
तो चली जाना ....
कभी जवाब न दूं तो ,
हाथ रखना मेरे सीने पर
महसूस करना
धड़कने आबाद न हो
तो
मुस्कुराना
और चली जाना .....


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