कोई भी दिन अलग नहीं होता !आज की सुबह भी खास नही थी, आम थी बिलकुल मेरी तरह ! उनींदे कदमों से मैं चाय की टपरी की तरफ बढ़ा जा रहा था ! बिना चाय की सुबह , असंभव ! बिलकुल फीका हो जाता है दिन ! उस पर भी चाय , जो शुद्ध आसाम की हो ! असम की चाय कुछ अलग ही होती है ! अपने आप मे अलग, थोड़ी सी तेज़ , थोड़ी कड़क , थोड़ी जिद्दी पर एक बार गर जायके पर चढ़ गयी तो दूसरी चाय फ़ीकी लगने लगेगी ! आज भी यहाँ की A1 चाय विदेशों मे चली जाती है ! बाकी जो बच जाती है वो हम लोग पीते हैं !
आज की बात थोड़ी अलग थी ! सड़के बिलकुल सुनसान, सहमे हुये चेहरे और सड़क के किनारे खड़े लोगों का हुजूम देखते हुये मैं आगे बढ़ रहा था ! धीरे धीरे नींद की खुमारी घटती जा रही थी, वास्तविकता के धरातल पर एक एक कदम रखता हुआ मैं आगे बढ़ रहा था ! चाय का स्वाद होठों से दूर था पर दिमाग मे चढ़ आया था ! तलब लग रही थी !
चाय की टपरी बंद पड़ी थी ! आसपास कई लोग खड़े थे ! भाजी वाला, फल वाला , किराना सबकी दूकाने बंद थी ! लोगों से पुछने पर पता चला की आसाम बंद है ! क्यूँ ?
क्यूंकी कुछ लोगों को अलगाववादियों ने गोली मार दी थी !
बात मेरे पते की नहीं थी ! अस्तु , मैं चलने लगा आगे, कुछ और आगे ! शायद आगे कोई टपरी दिख जाए ! पर आगे भी वही , मृगतृष्णा , मरुभूमि की ! सुबह सुबह अच्छा खासा टहलना हो गया था ! गर्मी भी लगने लगी थी ! मैं वापस लौट रहा था ! अचानक मैं ठिठक गया !
मुझे वो वृदधा दिखाई दी , जो रोज सुबह चाय वाले से चाय मांग कर पीती थी ! बेघर थी वह ! कुछ सत्तर , उम्र रही होगी उसकी ! गेहुआँ रंग , पर अब धूल मे लथपथ ! अपने बिछौने के साथ एक जगह बैठी रहती सड़क के किनारे पूरे दिन ! लोगों से मांग कर खाती ! होटल वाले भी दया कर के उसे कुछ दे देते थे ! मैं भी आगे बढ़ा ! 5 रुपये का एक सिक्का लेकर ! अचानक मुझे ख्याल आया की आज ये सिक्का भी उसके कुछ काम नहीं आएगा , क्यों की भूखे को भोजन चाहिए सिक्का नहीं ! (उस वृदधा की तस्वीर नहीं है ) कभी प्रेषित करूंगा !
सड़क पर लोग पैदल चल रहे थे ! कुछ एक मोटर साइकल वाले दिख रहे थे ! कुछ लोग पैदल ही सर पे समान रख कर स्टेशन जा रहे थे ! मैं भी वापस घर जा रहा था ! बिना चाय पीए ! अचानक से हारने वाली फीलिंग आने लगी ! पता नहीं क्यों मेरा मन वामपंथी बनता जा रहा था ! गुस्सा रुक ही नहीं रहा था, बार बार चाय की तलब आ रही थी ! पर क्या फायदा ? कोई उपाय नहीं था ! असहाय सा मैं कुछ कर नही पा रहा था ! वापस लौट आया !
असम बंद हो या बिहार ! उस दिन कई लोग मेरी तरह हार जाते होंगे ! कुछ लोग ज़िंदगी की जंग भी हार जाते हैं ! उन सभी लोगों के प्रति मेरे मन मे संवेदना है , जिनकी दवाई बंद के कारण नही मिलती , जिनकी सब्जी बंद के कारण नहीं बिकती या जिनकी मिठाई बासी हो जाती है ? गिना नहीं सकता ! या जिनके प्रतिदिन की आय 100 रुपया है उसे भी कमाने के अवसर छीन लेता है ये बंद ! बंद से किसी का भला नहीं !
अचानक से मुझे लगा जैसे सूर्य का प्रकाश मेरे अंदर ऊर्जा का संचार कर रहा हो ! सिर हल्का लगने लगा ! दो , ढाई किलोमीटर चलने के बाद लगा जैसे अब कोई तलब नही , एक संगीत सुनाई दे रहा था ! लगा जैसे नींद का खुमार अभी गायब हुआ हो ! उनींदे मन से कई बातें कह गया मैं ! अब जागृत अवस्था मे कुछ कहने का मन नहीं !
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद ! अपने मित्रों के संग साझा करें !
आज की बात थोड़ी अलग थी ! सड़के बिलकुल सुनसान, सहमे हुये चेहरे और सड़क के किनारे खड़े लोगों का हुजूम देखते हुये मैं आगे बढ़ रहा था ! धीरे धीरे नींद की खुमारी घटती जा रही थी, वास्तविकता के धरातल पर एक एक कदम रखता हुआ मैं आगे बढ़ रहा था ! चाय का स्वाद होठों से दूर था पर दिमाग मे चढ़ आया था ! तलब लग रही थी !
चाय की टपरी बंद पड़ी थी ! आसपास कई लोग खड़े थे ! भाजी वाला, फल वाला , किराना सबकी दूकाने बंद थी ! लोगों से पुछने पर पता चला की आसाम बंद है ! क्यूँ ?
क्यूंकी कुछ लोगों को अलगाववादियों ने गोली मार दी थी !
बात मेरे पते की नहीं थी ! अस्तु , मैं चलने लगा आगे, कुछ और आगे ! शायद आगे कोई टपरी दिख जाए ! पर आगे भी वही , मृगतृष्णा , मरुभूमि की ! सुबह सुबह अच्छा खासा टहलना हो गया था ! गर्मी भी लगने लगी थी ! मैं वापस लौट रहा था ! अचानक मैं ठिठक गया !
मुझे वो वृदधा दिखाई दी , जो रोज सुबह चाय वाले से चाय मांग कर पीती थी ! बेघर थी वह ! कुछ सत्तर , उम्र रही होगी उसकी ! गेहुआँ रंग , पर अब धूल मे लथपथ ! अपने बिछौने के साथ एक जगह बैठी रहती सड़क के किनारे पूरे दिन ! लोगों से मांग कर खाती ! होटल वाले भी दया कर के उसे कुछ दे देते थे ! मैं भी आगे बढ़ा ! 5 रुपये का एक सिक्का लेकर ! अचानक मुझे ख्याल आया की आज ये सिक्का भी उसके कुछ काम नहीं आएगा , क्यों की भूखे को भोजन चाहिए सिक्का नहीं ! (उस वृदधा की तस्वीर नहीं है ) कभी प्रेषित करूंगा !
सड़क पर लोग पैदल चल रहे थे ! कुछ एक मोटर साइकल वाले दिख रहे थे ! कुछ लोग पैदल ही सर पे समान रख कर स्टेशन जा रहे थे ! मैं भी वापस घर जा रहा था ! बिना चाय पीए ! अचानक से हारने वाली फीलिंग आने लगी ! पता नहीं क्यों मेरा मन वामपंथी बनता जा रहा था ! गुस्सा रुक ही नहीं रहा था, बार बार चाय की तलब आ रही थी ! पर क्या फायदा ? कोई उपाय नहीं था ! असहाय सा मैं कुछ कर नही पा रहा था ! वापस लौट आया !
असम बंद हो या बिहार ! उस दिन कई लोग मेरी तरह हार जाते होंगे ! कुछ लोग ज़िंदगी की जंग भी हार जाते हैं ! उन सभी लोगों के प्रति मेरे मन मे संवेदना है , जिनकी दवाई बंद के कारण नही मिलती , जिनकी सब्जी बंद के कारण नहीं बिकती या जिनकी मिठाई बासी हो जाती है ? गिना नहीं सकता ! या जिनके प्रतिदिन की आय 100 रुपया है उसे भी कमाने के अवसर छीन लेता है ये बंद ! बंद से किसी का भला नहीं !
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद ! अपने मित्रों के संग साझा करें !



0 Comments