तुम आओ मेरे सपनो में
सपने तो मेरे अपने हैं !
इन घंटों की बेचैनी की
जब आहट दिल में पाता हूँ
सब गातें हैं, मैं मंत्र-मुग्ध सा
ठिठक खड़ा रह जाता हूँ !
सब सोते हैं , प्रेमाचल में
मेरी ये रैन अँधेरी है
झपकी पलकें भी कहती हैं
तेरे आने की देरी है
ये गहन उदासी चीख चीख कर
तेरी आहट देती है
मैं चौंक चौंक कर जगता हूँ
थोड़ी उकताहट देती है
फिर विफल बना मैं थका-हारा
बोझिल पलकें झपकाता हूँ
तपती बाँहों के घेरों में
प्रियतम तुझको ही पाता हूँ !
विराम !
पूर्ण विराम ! कोई इस समय को रोक लो ! मुझे महसूस करने दो उसे , कुछ देर मेरी बाँहों में ! जरा बहने तो दो उसकी काल्पनिक उष्ण, सांसो को मेरे सीने के दरमियान !

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