शून्य

ये एक मानसिक द्वंद्व है .. 

श्री राम जाने। उन्होंने विचित्र मन क्यों बनाया। वो तो अपने मन से परेशां है। एक भ्रम है उसे। उसे पता ही नहीं चलता की उसका निर्णयकर्ता कौन है। मन या उसका ह्रदय। दोनों की आपस में नही बनती। सांप नेवले की कटुता भरी है। उसे पशोपेश में रखते हैं। दुविधाओं या उधेड़बुन के कारण उसके मस्तिष्क रूपी घर में मन और हृदय के आवेगों के बीच तलवारें गहरी खींच गयी हैं, जिसके खनकने की आवाजें उसके व्यवहार में दृष्टिगोचर होती हैं। कभी कभी उसकी आँखे स्वतः बंद होकर अपने भीतर झाँकने लगती हैं। मन और हिय का ये द्वंद्व उसकी आँखों से न छलक जाये और ये संसार उसकी हालत पर हंस न दे। डरता है वो।
उसने पार्क में बैठे एक बृद्ध से पूछा "उदास क्यों हो ?"
वो बोला " ज़माने पर जोर नही चलता "
अब मैं चलन में नही।
उसने पूछा " पहले कभी आपको यहाँ नहीं देखा।
बृद्ध बोला "कल ही रिटायर हुआ। घर
में मन नहीं लगा तो यहाँ आ गया। धुप भी अच्छी लगी और अजनबियों से बातें भी हो गयीं। वो मुस्कुराया और चुप हो गया।
दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा। बूढा बोला "अजीब सी बेचैनी हो रही है सोच नहीं पा रहा ,आगे क्या करूंगा ? कैसे रहूँगा? दिनचर्या क्या होगी ? अपने घर मे भी अपने अस्तित्व को ढूंढ नहीं पा रहा।
उसका आत्मबल दहल उठा। क्या मैं भी अपने अस्तित्व से अपरिचित हूँ ?
आँखे मुद ली। भीतर झाँका तो देखा मन और ह्रदय दोनों अपनी अपनी पे अड़े हुए एक दुसरे पर नजरों से वज्रपात कर रहें हैं। मन श्रृंगार का उपासक है तो ह्रदय साहित्य। मन वसंत की प्रतीक्षा कर रहा है तो ह्रदय पतझड़ की कामना (जब वृक्ष से पत्ते टूटकर गिरेंगे और वो साहित्य के रंगों में उसे उकेरेगा )
मन प्रणय निवेदन कर रहा है तो ह्रदय प्राण समर्पण।
"हे ईश्वर , यह कैसा द्वंद्व। '
हे प्रभु ,
क्या कभी इस द्वंद्व से छुटकारा हो पायेगा। कभी ऐसा हो की मेरा आत्मबल इतना दृढ हो की मैं मन और ह्रदय पर अंकुश लगा सकूँ। मेरा चित्त जहाँ कहीं भी रमें उसमे मेरे मन और ह्रदय का षड़यंत्र न हो। कभी ऐसा हो की मेरे साहित्य में दोनों के लक्ष्य समाहित हों और आत्मबल प्रतिबिंबित हो। मैं जीवन के सम-विषमो का तटस्थ भाव से सामना करूँ। प्रणय के समय में भी प्रेम को ह्रदय में समेटे उसके भाव को मन में धारण कर शुन्य में विहार करूँ।
हे देव। संयोग और वियोग का मेंरे साहित्य में समागम हो ताकि मन के लक्षित प्रणय को और ह्रदय के लक्षित उद्वेग को साहित्य में उड़ेल दूं।
त्राहिमाम त्राहिमाम।
मन का सूर्य अस्ताचल पर था। अँधेरा होने को था। बृद्ध गोपाल घर चले गए थे। ह्रदय की सरिता कल कल बह रही थी। मस्तिष्क चट्टान की तरह दृढ हो गया
और उसमे बैठा वो अपलक शुन्य में निहार रहा था।
अचानक आवाज आई । तुझे पता नही तूने क्या माँगा है। तूने तो 'मुक्ति' मांग ली।
अब प्रणय कहाँ, साहित्य कहाँ,सम विषम कहाँ मन और ह्रदय कहाँ ।आत्मा और शुन्य के अलावा और कुछ भी नही । तू शुन्य में विचरना चाहता है । तथास्तु ।
और उसके हृदय में शुन्य व्याप्त हो गया।
दुनिया में उसका कोई मोल न रहा। शुन्य की क्या कीमत ? संसार के गणित में वो उलझ न सका । अब वो शुन्य में विचरण करता है।
उसके पास मत जाना , मेल होने पर शुन्य बन जाओगे !


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