भीषण प्रतियोगिता के इस दौर में जब फुर्सत नहीं, लम्बी सांस लेने की भी तब कोई अगर खुद से बात कर ले तो खुदा भी खुश हो जाये . जी हां, खुद से बात करना ही तो ईश्वर तक पहुचने का रास्ता है ! "आत्म दीपो भव:" स्वयं को जानो ! आज की मेरी कविता यही प्रयास करती प्रतीत हो रही है !
जब कोई राह नही सूझता , इस होड़ में , संकट सा लगता है , अपना अस्तित्व पराया सा लगता है ! तब हताशा का अंधकार छाने लगता है! और मैं खुद से पूछने लगता हूँ " मैं क्या हूँ? "
जाने क्या हूँ ?
एक अनजान बालक
एक उभरता सितारा
एक मेहनती आवारा
किसी के आँखों का तारा
और बुढ़ापे का सहारा
जाने क्या हूँ ?
जाने कहाँ हूँ ?
खुशफ़हमी में ,
किसी के ख्वाबों में उठते हुए
सुनहले महल में !
अपने अँधेरे घर में
या इस मरते हुए शहर में
जाने कहाँ हूँ ?
तुम क्या हो ?
किसी चिड़िया का नाम
दौलत, शोहरत, नौकरी और इनाम
या शराब से भरा हुआ जाम !
लाखों जनों के हसरतों का बयां
या बेरोजगारों की दास्तान
तुम क्या हो ?
मैं क्या करता हूँ ?
गलतियाँ
सुधार और फिर गलतियाँ
जैसे पजल में उलझी उँगलियाँ
रोने वालों वालों के संग
भरता हूँ सिसकियाँ !
उन फरेबी आँखों में
सागर खोजा करता हूँ !
मैं क्या करता हूँ ?
जाने क्या हूँ ?
Amitabh
जब कोई राह नही सूझता , इस होड़ में , संकट सा लगता है , अपना अस्तित्व पराया सा लगता है ! तब हताशा का अंधकार छाने लगता है! और मैं खुद से पूछने लगता हूँ " मैं क्या हूँ? "
जाने क्या हूँ ?
एक अनजान बालक
एक उभरता सितारा
एक मेहनती आवारा
किसी के आँखों का तारा
और बुढ़ापे का सहारा
जाने क्या हूँ ?
जाने कहाँ हूँ ?
खुशफ़हमी में ,
किसी के ख्वाबों में उठते हुए
सुनहले महल में !
अपने अँधेरे घर में
या इस मरते हुए शहर में
जाने कहाँ हूँ ?
तुम क्या हो ?
किसी चिड़िया का नाम
दौलत, शोहरत, नौकरी और इनाम
या शराब से भरा हुआ जाम !
लाखों जनों के हसरतों का बयां
या बेरोजगारों की दास्तान
तुम क्या हो ?
गलतियाँ
सुधार और फिर गलतियाँ
जैसे पजल में उलझी उँगलियाँ
रोने वालों वालों के संग
भरता हूँ सिसकियाँ !
उन फरेबी आँखों में
सागर खोजा करता हूँ !
मैं क्या करता हूँ ?
जाने क्या हूँ ?
Amitabh

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