आदिवासी का अर्थ है आदिम निवासी . पुराने लोग जो मानव सभ्यता से दूर हों. हिन्दू आदिवासिओं को वनवासी भी कहते हैं . यूँ कहिये प्रकृति पूजक जंगलों में रहने वाले लोग . आदिवासियों को भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति के नाम से पुकारा गया है . आदिवासी विश्व के विभिन्न दुर्गम स्थानों में निवास करते हैं . सभ्यता से दूर इनकी एक अलग दुनिया है . जहाँ ये अपनी मान्यताओं का स्वतंत्रता पूर्वक निर्वाह करते हैं . यहाँ हम समूचे विश्व के आदिवासियों में प्रचलित मान्यताओं को हिन्दू सनातन धर्म के आलोक में देखेंगे .
समूचे विश्व के आदिवासियों में एक बात की समानता होती है, ये प्रकृतिपूजक होते हैं . ये जंगल, नदी , पेड़, सूर्य , चन्द्रमा , गौ आदि पशुओं को पूजते है .. ये धार्मिक होते है . ये आस्तिक होते हैं . और अपनी आस्था के प्रति असहिष्णु भी . ये अभी भी समय की गणना घड़ियों से नहीं अपितु सूर्य चन्द्र आदि के स्थान से निर्धारित करते हैं .. सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण इन आदिवासिओं के लिए खास होता है . इस अवसर पे वो कुछ विशेष कार्यक्रम का आयोजन करते हैं . कुछ आदिवासी जिनमे बलिप्रथा है अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए बलि देते है .. दूसरे कुछ सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को अशुभ सूचक भी मानते है .जैसा की सनातन धर्मावलम्बी भी मानते है .. इस तरह से हम देखते हैं की सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का प्रभाव आर्यों की तरह ही इनके आस्था पर प्रभाव डालता है .
प्रश्न यह उठा की आदिवासी हिन्दू है या नही .
इस प्रश्न के उत्तर से पहले मैं हिन्दुओं से आग्रह करना चाहता हूँ की क्यों न अपने धर्म का अवलोकन किया जाये, क्यों न खुद से ये पूछा जाये की हम कितने आदिवासी(वनवासी) हैं ?
सभ्यता के आरम्भ से ही हम वनवासी थे . मनु और शतरूपा के उद्भव के साथ ही हमे विरासत में अपार वन सम्पदा मिली . मनु के पुत्र-पुत्रियों का देवताओं और सप्तऋषियों के साथ समागम ने मानव सभ्यता का निर्माण किया . वेदों का ज्ञान हमे सभ्यता के आरम्भ में ही था . ईश्वरतत्व् की खोज में मनुपुत्र लगे रहे . प्रकृति (ईश्वर) एक पहेली है और मानव अबोध. जब भी मानव को ज्ञानतत्त्व की आवश्यकता होती, या सृष्टि के सृजन से आश्चर्य होता वो वन में चला जाता था . वन में अपनी तपस्या और अनुसन्धान के बल से वह ऋषि कहलाता.
"असतो माँ सद्गमय
तमसो माँ ज्योतिर्गमय
मृत्योरमामृतंगमय " के ज्ञान ने मनुष्यों को छल, तम, पाप , कलुष से सफलता पूर्वक बचाए रखा . इसे ही हम सत्ययुग कहते हैं .. सत्ययुग में आर्य वस्तुतः वनवासी थे. चलिए एक उदहारण लेते हैं . हम सत्यनारायण की कथा सुनते हैं , क्या है इस कथा में ? इस कथा का नायक एक वनवासी(लकडहारा) है,जो जंगल से लकड़ियाँ चुनकर ले आता है . उसे इस बात का भान है की प्रकृति जागृत है और हरे भरे पेड़ों में भी जीवन हैं , ये वो दौर था जब जीवन आदर्श की कसौटी पर रखा जाता था . पाप पुण्य जागृत थे , प्रकृति जागृत थी . क्षमतावान न्याय कर देता और प्रजा मान लेती . पर समाज के पथ प्रदर्शक ऋषि मुनिगण , जंगलो में, कंदराओं में , नदी के निर्जन तट पर , या दुर्गम पर्वत पर कुटिया बनाकर रहते थे . इनका जीवन आज के आदिवासियों की तरह था पूरी तरह से प्राकृत. कृत्रिमता का आभाव था .ज्ञान , वेदाध्ययन और ईश्वर प्राप्ति के लिए लोग वनों में जाते थे . यह मानव का प्रकृति से सम्बद्धता का सूचक था . एक प्रश्न उठता है ,
क्या वेदों का ज्ञान ईश्वर को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं ?
क्यों तपस्या करने के लिए लोग वनों में जाते थे , समाज से दूर , एकांत प्रकृति के बीच ? वस्तुतः मनुष्य का जिज्ञासु स्वाभाव उसे प्रकृति की ओर खीचता था . कई ऋषियों ने वनों में वर्षों अनुसन्धान किये और मानव सभ्यता के लिए बहुत कुछ ढूँढा ." कण ही सभी तत्वों का सूक्ष्मतम रूप है" , महर्षि कणाद ने बताया. च्यवन ऋषि ने आयुर्वेद के अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया ,महर्षि अगस्त्य ने ब्रम्हांड के रहस्यों को उजागर किया . ये ज्ञान आज भी मानव सभ्यता की सेवा कर रहा है जो की वनवासियों की देन है , सप्तऋषि आज भी है ये आदि पुरुष है .. सभ्यता के अंत तक रहेंगे . शायद आज ये आदिवासिओं के बीच रहते हों .. ये भी शोध का विषय है .
अब देखें हिन्दुओं में आदिवासियों के कितने गुण मिलते हैं . वट सावित्री व्रत आज भी हिन्दू स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है , इस में वटवृक्ष में धागे बांधे जाते हैं , इसी तरह से पीपल, तुलसी आदि को भी पवित्र मन गया है . अगर हम आदिवासियों में देखें तो ये भी वट , पीपल, महुआ, आवला आदि वृक्षों को पवित्र मानते हैं ,, विश्व के विभिन्न भागों की आदिवासी जनजातियाँ स्थानीय वनस्पतियों में कुछ को अवश्य पवित्र मानती है और उनकी पूजा करती है . नदियों, चट्टानों, कन्दरों , आदि जहाँ कही भी इन्हें अदृश्य शक्ति का आभास होता है वो इस जगह को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते है .. जो की सनातन हिन्दू धर्म की मूल प्रवृति से मेल खाती है . पूर्व भारत के बिहार आदि राज्यों में सूर्य षष्ठी का व्रत(छठ महापर्व )मनाया जाता है . इसमें भगवन सूर्य और नदी की उपासना की जाती है . आदिवासी भी वनदेवी की उपासना करते है जो उनकी मान्यता के अनुसार उनके सभी कष्टों का निवारण करती हैं . इस परिपेक्ष्य में देखें तो मैदानी लोगो ने मैदान में निवास के बाद मैदानी प्रकृति (सूर्य और नदी ) की पूजा की और आदिवासियों ने वन की आदिम संस्कृति के अनुसार वनदेवी की . इस तरह से हम देखें तो स्थान विशेष में परिवर्तन के कारण ही उपासना में सूक्ष्म अंतर आया . मानव और वनवासी दोनों प्रकृति को पूजते रहे .
प्रश्न ये भी उठता है की अगर सम्पूर्ण आदिवासी जातियां हिन्दू थी तो ये ब्रम्हा, विष्णु, महेश आदि की पूजा इन रूपों में क्यों नही करतीं जैसे आज हिन्दू समाज करता है ?
इस प्रश्न के उत्तर में हमे कहीं जाने की जरुरत नही अपितु फिर से अपने इतिहास को झाँकने की जरूरत है .
"हम कौन थे , क्या हो गये , और क्या होंगे अभी "
चलिए अपने धर्मग्रंथों से साक्ष्य के की हिन्दुओं की पूजा पद्धतियाँ कैसी रहीं थी . सत्ययुग में सिर्फ तपस्या का वर्णन है .. लोग ईश्वर की प्राप्ति के लिए वन में तपस्या के लिए जाते थे ,, कुछ व्रत उपवासों का भी उल्लेख होता है जैसे सत्यनारायण व्रत , वटसावित्री व्रत , आदि . इन सभी व्रतों के मूल में देखें तो प्रकृति पूजा की अतिरिक्त कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता . इन पूजाओं में सप्तधान्य(सात तरह के अन्न ), सप्तमृतिका (सात जगह की मिटटी ) , सर्वोषधि (तरह तरह की औसधियां ), जल (गंगा , यमुना , गोदावरी , कावेरी आदि का ), आम्र पल्लव आदि का जिक्र आता है , इनमे आत्मिक शुद्धि पर बल दिया गया था न की आज की तरह भौतिक आडम्बर पर. .. चलिए त्रेता युग में देखे .. एक वर्णन आता है की माता सीता जब देवी पूजन को निकली तब उन्होंने राम लक्षमण दोनों भाइयों को वाटिका में पुष्प चुनते देखा .फिर प्रभुै श्रीराम ने रावण पर विजय से पहले रामेश्वरम में शिव का पूजन किया . आज के मंदिर उन्ही के स्मृति चिन्ह है जहाँ प्रभु के अवतारों ने लीला रची . फिर एक प्रसंग आता है , जब माता सीता को वनवास दिया गया तब महर्षि बाल्मीकि उन्हें अपने आश्रम ले आये जहाँ उन्हें वनदेवी के नाम से संबोधित किया गया . त्रेता में वनवासी राजा निषादराज गुह का भी वर्णन आता है . जब राम को वनवास की आज्ञा मिली तो निषाद राज ने उन्हें अपने यहाँ रह्ने और राजा बनाने का प्रस्ताव दिया इस तरह त्रेता में भी हम देखे तो प्रभु श्रीराम और अन्य वनवासी ऋषियों के कई चरित्र दीखते है .
द्वापर युग में भी प्रभु श्री कृष्ण को संदीपन मुनि के आश्रम में भेजा गया , वहां वे सुदामा के साथ जंगल से लकड़ियाँ चुन कर लाते . वृन्दावन प्रभु की कर्मस्थली रही . वही द्वापर में ही जिक्र आता है एकलव्य का . जिसे गुरु द्रोणआचार्य ने धनुर्विद्या का ज्ञान यह कहकर नही दिया की वो सिर्फ राजवंशियों को ही धनुर्विद्या का ज्ञान देंगे . पर धून का पक्का एकलव्य धनुर्विद्या सीख ही लेता है . इस तरह हम देखते है की वनवासियों के प्रति थोड़ी हीनता की भावना का जन्म आज से कुछ ५००० वर्ष पहले महाभारत काल में हुआ . ये भी सुखद है की बाद में इसी एकलव्य ने महाभारत के युद्ध में भी भाग लिए . इससे ये आशय निकलता है की तब वनवासी भी मैदानी लोगों से जुड़े हुए थे . कालांतर में हमारी संस्कृति में भी अंतर पैदा हुआ और अब हमे आदिवासियों की संस्कृति बहुत भिन्न दिखाई पड़ती है .
हमारे सत्य सनातन धर्म में चार आश्रम बताए गए हैं . ब्रम्हचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास . प्रथम ब्रम्हचर्य में मानव को प्रकृति की गोद में रहकर विद्या और बल अर्जित करने को कहा गया है . यही कारण था की पुराने गुरुकुल वनों में हुआ करते थे . गृहस्थ आश्रम में समाज में रहकर धन अर्जित करने और कुटुंब के पालन-पोषण का आदेश दिया गया है . तीसरा आश्रम वानप्रस्थ आश्रम कहलाता है . वानप्रस्थ आश्रम का उद्देश्य है ईश्वर की प्राप्ति हेतु तयारी , जिसमे काम, क्रोध , लोभ , मोह के साथ समाज का भी त्याग कर वन में चले जाना . एक वनवासी की तरह प्रकृति के अंक में पलना और जीवन के चौथे पड़ाव में सन्यास ग्रहण करना जिससे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके . वस्तुतः मूल हिन्दू धर्म तीन चौथाई आदिवासी और एक तिहाई मैदानी है .
दुर्भाग्य से एक बड़े षड्यंत्र के तहत इन आदिवासियों का बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन कराया जा रहा है . जो की बहुत गलत है . मानव को सभी की मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए न की सभी को एक ही रंग में रंगने का प्रयास . सम्पूर्ण विश्व के आदिवासियों की प्रथाएं हिदू सत्य सनातन धर्म से मेल खाती है . सनातन धर्म के ही विकृत रूप है. सनातन धर्म ही मूल है . अन्य सभी धर्म सनातन धर्म की शाखाओं की व्याख्या कर के अपना महिमा मंडन करने में लगे है . इसी क्रम में धर्म प्रचार की पाठशालाएं खुली है . भारत में भी अन्य जातियों और जनजातियों को में धर्मपरिवर्तन का व्यापार जोरों पर है . परन्तु लोग सत्य भूल जाते है की धर्म धारण करने की चीज है दिखावे की नहीं . धर्म मनुष्य के आत्मा की रक्षा करता है .. धर्म मनुष्य को कर्त्तव्य पथ पर प्रेषित करता है . धर्म सद्गति देता है . धर्म शांति देता है . धर्मो रक्षति रक्षित: !!
सभी मैदानी लोगो को आदिवासी संस्कृति का आदर करना चाहिए . उनपे अपनी अन्ग्रेज़ी न थोपे . उन्हें मूल रूप में रहने दे यदि हो सके तो उनकी मुलभुत समस्याओं का समाधान करें . वनों को समृद्ध करें . प्रकृति से छेड़छाड़ बंद हो . धर्म परिवर्तन का षड्यंत्र बंद हो . असतो मा सद्गमय !!
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अमिताभ
समूचे विश्व के आदिवासियों में एक बात की समानता होती है, ये प्रकृतिपूजक होते हैं . ये जंगल, नदी , पेड़, सूर्य , चन्द्रमा , गौ आदि पशुओं को पूजते है .. ये धार्मिक होते है . ये आस्तिक होते हैं . और अपनी आस्था के प्रति असहिष्णु भी . ये अभी भी समय की गणना घड़ियों से नहीं अपितु सूर्य चन्द्र आदि के स्थान से निर्धारित करते हैं .. सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण इन आदिवासिओं के लिए खास होता है . इस अवसर पे वो कुछ विशेष कार्यक्रम का आयोजन करते हैं . कुछ आदिवासी जिनमे बलिप्रथा है अपने देवी-देवताओं को खुश करने के लिए बलि देते है .. दूसरे कुछ सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को अशुभ सूचक भी मानते है .जैसा की सनातन धर्मावलम्बी भी मानते है .. इस तरह से हम देखते हैं की सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का प्रभाव आर्यों की तरह ही इनके आस्था पर प्रभाव डालता है .
इस प्रश्न के उत्तर से पहले मैं हिन्दुओं से आग्रह करना चाहता हूँ की क्यों न अपने धर्म का अवलोकन किया जाये, क्यों न खुद से ये पूछा जाये की हम कितने आदिवासी(वनवासी) हैं ?
सभ्यता के आरम्भ से ही हम वनवासी थे . मनु और शतरूपा के उद्भव के साथ ही हमे विरासत में अपार वन सम्पदा मिली . मनु के पुत्र-पुत्रियों का देवताओं और सप्तऋषियों के साथ समागम ने मानव सभ्यता का निर्माण किया . वेदों का ज्ञान हमे सभ्यता के आरम्भ में ही था . ईश्वरतत्व् की खोज में मनुपुत्र लगे रहे . प्रकृति (ईश्वर) एक पहेली है और मानव अबोध. जब भी मानव को ज्ञानतत्त्व की आवश्यकता होती, या सृष्टि के सृजन से आश्चर्य होता वो वन में चला जाता था . वन में अपनी तपस्या और अनुसन्धान के बल से वह ऋषि कहलाता.
"असतो माँ सद्गमय
तमसो माँ ज्योतिर्गमय
मृत्योरमामृतंगमय " के ज्ञान ने मनुष्यों को छल, तम, पाप , कलुष से सफलता पूर्वक बचाए रखा . इसे ही हम सत्ययुग कहते हैं .. सत्ययुग में आर्य वस्तुतः वनवासी थे. चलिए एक उदहारण लेते हैं . हम सत्यनारायण की कथा सुनते हैं , क्या है इस कथा में ? इस कथा का नायक एक वनवासी(लकडहारा) है,जो जंगल से लकड़ियाँ चुनकर ले आता है . उसे इस बात का भान है की प्रकृति जागृत है और हरे भरे पेड़ों में भी जीवन हैं , ये वो दौर था जब जीवन आदर्श की कसौटी पर रखा जाता था . पाप पुण्य जागृत थे , प्रकृति जागृत थी . क्षमतावान न्याय कर देता और प्रजा मान लेती . पर समाज के पथ प्रदर्शक ऋषि मुनिगण , जंगलो में, कंदराओं में , नदी के निर्जन तट पर , या दुर्गम पर्वत पर कुटिया बनाकर रहते थे . इनका जीवन आज के आदिवासियों की तरह था पूरी तरह से प्राकृत. कृत्रिमता का आभाव था .ज्ञान , वेदाध्ययन और ईश्वर प्राप्ति के लिए लोग वनों में जाते थे . यह मानव का प्रकृति से सम्बद्धता का सूचक था . एक प्रश्न उठता है ,
क्या वेदों का ज्ञान ईश्वर को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं ?
क्यों तपस्या करने के लिए लोग वनों में जाते थे , समाज से दूर , एकांत प्रकृति के बीच ? वस्तुतः मनुष्य का जिज्ञासु स्वाभाव उसे प्रकृति की ओर खीचता था . कई ऋषियों ने वनों में वर्षों अनुसन्धान किये और मानव सभ्यता के लिए बहुत कुछ ढूँढा ." कण ही सभी तत्वों का सूक्ष्मतम रूप है" , महर्षि कणाद ने बताया. च्यवन ऋषि ने आयुर्वेद के अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया ,महर्षि अगस्त्य ने ब्रम्हांड के रहस्यों को उजागर किया . ये ज्ञान आज भी मानव सभ्यता की सेवा कर रहा है जो की वनवासियों की देन है , सप्तऋषि आज भी है ये आदि पुरुष है .. सभ्यता के अंत तक रहेंगे . शायद आज ये आदिवासिओं के बीच रहते हों .. ये भी शोध का विषय है .
प्रश्न ये भी उठता है की अगर सम्पूर्ण आदिवासी जातियां हिन्दू थी तो ये ब्रम्हा, विष्णु, महेश आदि की पूजा इन रूपों में क्यों नही करतीं जैसे आज हिन्दू समाज करता है ?
इस प्रश्न के उत्तर में हमे कहीं जाने की जरुरत नही अपितु फिर से अपने इतिहास को झाँकने की जरूरत है .
"हम कौन थे , क्या हो गये , और क्या होंगे अभी "
चलिए अपने धर्मग्रंथों से साक्ष्य के की हिन्दुओं की पूजा पद्धतियाँ कैसी रहीं थी . सत्ययुग में सिर्फ तपस्या का वर्णन है .. लोग ईश्वर की प्राप्ति के लिए वन में तपस्या के लिए जाते थे ,, कुछ व्रत उपवासों का भी उल्लेख होता है जैसे सत्यनारायण व्रत , वटसावित्री व्रत , आदि . इन सभी व्रतों के मूल में देखें तो प्रकृति पूजा की अतिरिक्त कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता . इन पूजाओं में सप्तधान्य(सात तरह के अन्न ), सप्तमृतिका (सात जगह की मिटटी ) , सर्वोषधि (तरह तरह की औसधियां ), जल (गंगा , यमुना , गोदावरी , कावेरी आदि का ), आम्र पल्लव आदि का जिक्र आता है , इनमे आत्मिक शुद्धि पर बल दिया गया था न की आज की तरह भौतिक आडम्बर पर. .. चलिए त्रेता युग में देखे .. एक वर्णन आता है की माता सीता जब देवी पूजन को निकली तब उन्होंने राम लक्षमण दोनों भाइयों को वाटिका में पुष्प चुनते देखा .फिर प्रभुै श्रीराम ने रावण पर विजय से पहले रामेश्वरम में शिव का पूजन किया . आज के मंदिर उन्ही के स्मृति चिन्ह है जहाँ प्रभु के अवतारों ने लीला रची . फिर एक प्रसंग आता है , जब माता सीता को वनवास दिया गया तब महर्षि बाल्मीकि उन्हें अपने आश्रम ले आये जहाँ उन्हें वनदेवी के नाम से संबोधित किया गया . त्रेता में वनवासी राजा निषादराज गुह का भी वर्णन आता है . जब राम को वनवास की आज्ञा मिली तो निषाद राज ने उन्हें अपने यहाँ रह्ने और राजा बनाने का प्रस्ताव दिया इस तरह त्रेता में भी हम देखे तो प्रभु श्रीराम और अन्य वनवासी ऋषियों के कई चरित्र दीखते है .
हमारे सत्य सनातन धर्म में चार आश्रम बताए गए हैं . ब्रम्हचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास . प्रथम ब्रम्हचर्य में मानव को प्रकृति की गोद में रहकर विद्या और बल अर्जित करने को कहा गया है . यही कारण था की पुराने गुरुकुल वनों में हुआ करते थे . गृहस्थ आश्रम में समाज में रहकर धन अर्जित करने और कुटुंब के पालन-पोषण का आदेश दिया गया है . तीसरा आश्रम वानप्रस्थ आश्रम कहलाता है . वानप्रस्थ आश्रम का उद्देश्य है ईश्वर की प्राप्ति हेतु तयारी , जिसमे काम, क्रोध , लोभ , मोह के साथ समाज का भी त्याग कर वन में चले जाना . एक वनवासी की तरह प्रकृति के अंक में पलना और जीवन के चौथे पड़ाव में सन्यास ग्रहण करना जिससे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके . वस्तुतः मूल हिन्दू धर्म तीन चौथाई आदिवासी और एक तिहाई मैदानी है .
सभी मैदानी लोगो को आदिवासी संस्कृति का आदर करना चाहिए . उनपे अपनी अन्ग्रेज़ी न थोपे . उन्हें मूल रूप में रहने दे यदि हो सके तो उनकी मुलभुत समस्याओं का समाधान करें . वनों को समृद्ध करें . प्रकृति से छेड़छाड़ बंद हो . धर्म परिवर्तन का षड्यंत्र बंद हो . असतो मा सद्गमय !!
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अमिताभ


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