चिकन पर चर्चा


सुबह सुबह मुर्गा भात खाकर साहब टाइट हो गए। गरम मसाले की गर्मी से खून खौलने लगा । अंदर मुर्गा कमाल दिखा रहा था। पत्नी को दो चार जली-कटी सुनाई और लगे धौस जमाने । जब देखा कि दुधारू गाय की तरह पत्नी महारानी का लात अब उनके पामर मुख पर पड़ने वाला है तो भाग लिए। मुर्गा अभी पेट मे पच रहा था।

ऑफिस में गर्मी झाड़ने का अच्छा अवसर मिला। 
हुआ यूं कि किसी सहकर्मी से, जो की मंदिर दर्शन करने गए थे किसी पंडा जी ने 50 रुपये लेकर जल्दी दर्शन करा दिए। ये  बात सुन के उनका मुंह हलवे जैसा बन गया। आनन फानन मे एक सभा का आयोजन किया। ऑफिस से सभी मुख्य सदस्य सामने थे। सब के चेहरे पे सुकून।सब लोग गप का मज़ा लेने जो आ पहुंचे थे  ! चपरासियों को बताया गया कि अंदर मीटिंग चल रही है। साहब ने उस सहकर्मी को बुलाकर घटना की गंभीरता का जायजा लिया ! पूरी आपबीती  सुनने के बाद अदरक सा  मुंह बनाकर सहेब बोल उठे।

साहेब उवाच।

ये पंडे 3000 साल से हमसे मैला ढुलवा रहे हैं (पर शौचालय तो 20 साल पहले ही बने हैं सब लोग खेतों में जाते थे) ।
साहेब की अंतर आत्मा बोली
अंतरात्मा के मुह पर टेप साट कर साहेब बोले!
" मंदिरों का पैसा समाज के कल्याण में लगना चाहिए। "
अंतरात्मा हँसी !
पिछले महीने जब प्राचीन शिव मंदिर की दान पेटी खुली थी तो मुहल्ले वालों ने साहेब को अध्यक्ष बनाया । साहेब ने सामुदायिक भवन की नींव रखने की वकालत की । नींव रखने की कमेटी ने पूरे 10 लाख रुपये का खर्चा बताया , पर खर्च 6 लाख ही हुए। 2 लाख साहेब और लाख लाख रुपया दो और मित्रों ने चाट लिया। वहीं पुजारी जी का बेटा नौकरी न मिलने के कारण घर का खर्च चलाने के लिए ऑटो चलाने पर मजबूर हो गया ।

ऐसी बात नही थी की साहब धार्मिक नहीं थे !

 साहेब ने पिछले साल दशहरा में घर मे कलश स्थापना कराया था । पंडित जी पूरे नौ दिन तक फलाहार पर पूजा किये । साहेब ने मधुर स्वर में कहा कि बाबा मेरे यहाँ के सभी बर्तन मांस मछली के हैं आप अपने घर पर शुद्ध कुछ बनवा लिया कीजिये। मैं दक्षिणा में जोड़ कर पैसे दे दूंगा। नौ दिन पूजा सम्पन्न होने के बाद दक्षिणा के नाम पर  1000 रुपये लेकर वो पंडित जी की तरफ बढ़े।
पंडित जी ने कहा , यजमान दक्षिणा तो सात हजार होगी । 6 घंटे पूरे लगते हैं सम्पुट पाठ करने में।
 साहब का दिमाग चकराया ।
 मुर्गा पेट मे तो नही था पर उसका रस नस नस में दौड़ रहा था। अपनी पत्नी को भेजा अगल बगल की महिलाओं से पता करने को। सबने संपुट पाठ की दक्षिणा  उससे ज्यादा ही बताई।
 अब तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था? अपनी गाढ़ी कमाई का 7000 रुपया वो एक ब्राह्मण को दे देंगे ये असंभव सा प्रतीत हो रहा था।

पंडित जी की ओर 3000 रुपया लेकर बोझिल पैरों से आगे बढ़े! बोले ये लीजिये पंडित जी , आशीर्वाद दीजिये। 
पंडित जी नही माने।
 बोले आपको किसी चीज की कमी नही , फिर इतनी कम दक्षिणा में नही लूँगा। सरल स्वभाव वाले पंडित जी को ऐसा बोलते सुनकर उनका कलेजा मुँह  को आ गया। लगा जैसे पैरो तले जमीन खिसक गयी हो !  प्रत्येक महीने बेटे को 20000 भेजते हुए भी कभी इतना नही खला जितना आज खल गया। मन ही मन बोले पहले पता होता तो पूजा ही नही करवाता । इतना लालची पंडित तो आजतक नही देखा। अपनी पत्नी को 2 उंगलियों से इशारा किया । पत्नी 2000 और ले आई। अब 5000 हो गए। मन ही मन क्रुद्ध परंतु सीना तान कर पंडित जी की ओर बढ़े ! ये लीजिये और आशीर्वाद दीजिये। 
पंडित जी बड़े विनम्रता से बोले। 
साल में सिर्फ दो ही नवरात्र आते हैं ! हम 9 दिन तक पवित्रता से पाठ करके माता रानी की आराधना करते हैं ताकि यजमान सुखी हो और जो भी कुछ दक्षिणा मिले उससे घर के सदस्यों के नए कपड़े आयें । मैं यजमान वृति करने वाला ब्राह्मण हूँ ! आप कम से कम 7000 दीजिये ।।। इससे कम में नही चलेगा। साहेब की नजरें नीची हो गयी। गुस्से की अधिकता से आवाज लुप्त हो गयी । घुप्प शांति छा गयी।  पंडित जी ने अपना झोला उठाया और चल दिये। अपमान उन्हें पसंद न था । वैसे भी पैसे वालों का क्या भरोसा 

उस घटना के दो महीने बीत गए हैं । आज भी साहेब अकुलाए रहते हैं । कभी पंडित जी से नजर मिल जाये तो उनका मूड दिन भर खराब रहता है। 
पहले महीने तो वो प्रतीक्षा में रहे कि कब पंडित जी आयें अपना बकाया मांगने और वो ताने दें ,, पर वो शुभ दिन आया ही नहीं ।  
दूसरे महीने उन्होंने पता लगाने का प्रयत्न किया कि ये बात कहा तक फैली पर कुछ विशेष हाथ न लगा। 
साहेब का किताबी ज्ञान अधूरा रह गया । हारने वाली फीलिंग्स आने लगी। कितनी बार मन में आया कि पंडित को उसकी दक्षिणा दे आएं पर जो कल्पित मुस्कान पंडित के चेहरे पे आएगी उसकी कल्पना भी उन्हे बरदास्त न थी !

आज की मीटिंग में साहेब ने पहले तो जम के पैसे लेने वाले पंडे को खरी खोटी सुनाई  फिर वो 50 रुपये की व्याख्या करने लगे। 50 रुपये में मजदूर दो जून खाना खा लेगा। 50 रुपये में आदमी 50 किलोमीटर यात्रा कर लेगा। इत्यादी ।

दो घंटे हो चुके थे स्टाफ भी उकता चुके थे मीटिंग से। हां में हां मिलाना विवशता थी। अस्तु सरकारी दफ्तर था विशेष चिंता नही थी। कुंठा वमन करने के पश्चात भी आज मैं को शांति नही मिल रही थी। याद आ रहा था किस तरह पंडित जी के बेटे के ऑटो में बैठने के बाद समान खरीदने के बहाने पूरे सहर के चक्कर लगवाए थे वो भी 100 रुपये में कोई दूसरा होता तो 200 से कम में न मानता।

मीटिंग पूरी हुई।

ये अपने केबिन में जाकर धम्म से बैठ गए। बिसलेरी की बोटल गटकते हुए दिमाग शून्य हुआ जा रहा था। प्रलाप करने का मन कर रहा था।

फेसबुक खोल के बैठ गए।

Oath Breaker के वाल की पोस्ट देखकर सांस ही अटक गई।

क्या अब पंडित पूजा पाठ छोड़ देंगे?

 अभी पिछले दिनों कबीर पंथियों से कीर्तन करवाया था घर मे ,सीने पे चढ़कर 30000 रुपये लेकर गए। हाय हाय करता रह गया मन फिर भी मुँह खोलने की हिम्मत न हुई। पिछले साल आर्यसमाजी हवन में भी कुछ वैसा ही खर्च आया था।।

आज साहेब कुछ न कुछ क्रांति ला कर रहेंगे । मुर्गा उनके पेट मे है , रस तैयार हो रहा है। वामपंथियों की पोस्ट पढ़कर धरती पुत्र जाग उठा !
 Facebook पे उन्होने लिखा , 
तुम क्या जानोगे सनातन धर्म की सुंदरता। हम महाकाल के भक्त हैं खतरों से खेला करते हैं। आदि, आदि !
जो हाथ पुरोहित को उचित दक्षिणा नही दे पाया उसी हाथ पर शाम तक 40000 रुपये घूस के  आ गए। कुछ बांट कर 30000 पॉकेट में रख कार घुमाकर घर पहुंचे ही थे कि सामने पंडित जी नजर आ गए। BP फिर बढ़ गया।

घर के अंदर आ कर सबसे पहले फेसबुक खोला, Oath Breaker सर्च कर के ब्लॉक मारा। फिर थोड़ा पानी पिया। अब थोड़ा चैन मिला। गली में तो पंडित के कारण BP बढ़ ही जाता है कम से कम फेसबुक तो चैन से चलाऊं।
पेट का मुर्गा पच चुका था। दूसरा मुर्गा सामने प्लेट में रखा था।


धन्यवाद !

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